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ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के श्राद्ध का दिन है सर्वपितृ अमावस्या

ज्ञात-अज्ञात सभी पितरों के श्राद्ध का दिन है सर्वपितृ अमावस्या

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 21 दिन 21 घंटे पूर्व
22/09/2019
भोपाल [महामीडिया ]भारतीय परंपरा में आश्विन मास वर्ष के सभी 12 मासों में खास माना जाता है। इसी मास में देवी आराधना का उत्सव नवरात्र होता है, लेकिन उससे पहले पितरों की कृतज्ञता का पर्व श्राद्ध-पक्ष मनाया जाता है इस पर्व का समापन आश्विन मास की अमावस्या को होता है। इसे सर्वपितृ-मोक्ष अमावस्या कहा जाता है। पितृ अमावस्या होने के कारण इसे पितृ-विसर्जनी अमावस्या या महालया भी कहा जाता है।पितृपक्ष का आरंभ भाद्रपद पूर्णिमा से हो जाता है   । आश्विन माह का पहला पखवाड़ा जो कि माह का कृष्ण-पक्ष भी होता है पितृपक्ष के रूप में जाना जाता है। इन दिनों में हिंदू धर्मावलंबी दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हैं। उन्हें याद करते हैं, उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।उनकी आत्मा की शांति के लिए स्नान, दान, तर्पण आदि किया जाता है। पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के कारण ही इन दिनों को श्राद्ध भी कहा जाता है। हालांकि विद्वान ब्राह्मणों ने कहा है कि जिस तिथि को दिवंगत आत्मा संसार से गमन करके गई थी आश्विन मास के कृष्ण-पक्ष की उसी तिथि को पितृ शांति के लिए श्राद्ध कर्म किया जाता है। फिर भी यदि किसी वजह से हम अपने पितर का उस दिन श्राद्ध नहीं कर पाए तो आप अमावस्या को भी उनका श्राद्ध कर सकते हैं। इसी तरह इस दिन उन सारे पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं, जिनकी तिथि ज्ञात नहीं है और उन सबका भी जो हमें याद नहीं है सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध किया जा सकता है।दूसरा वर्तमान में जीवन भागदौड़ भरा है। हर कोई व्यस्त है। फिर विभिन्ना परिजनों की तिथियां अलग-अलग होने से हर रोज समय निकाल कर श्राद्ध करना बड़ा ही कठिन है। इसलिए भी विद्वान ज्योतिषाचार्यों ने कुछ ऐसे भी उपाय निकाले हैं जिनसे आप अपने पूर्वजों को याद भी कर सकें और जो आपके समय के महत्व को भी समझे। अपने पितरों का अलग-अलग श्राद्ध करने की बजाय सभी पितरों के लिए एक ही दिन श्राद्ध करने का विधान बताया गया। इसके लिए कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि अर्थात अमावस्या का महत्व बताया गया है। समस्त पितरों का इस अमावस्या को श्राद्ध किए जाने के विधान के कारण ही इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है।चूंकि इस दिन सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है इसलिए यह तिथि 16 दिन में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। वहीं इस अमावस्या को श्राद्ध करने के पीछे मान्यता है कि इस दिन पितरों के नाम की धूप देने से मानसिक व शारीरिक संतुष्टि या कहें शांति प्राप्त होती ही है। साथ ही घर में भी सुख-समृद्धि आती है। सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं। हालांकि प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को पिंडदान किया जा सकता है लेकिन आश्विन अमावस्या विशेष रूप से शुभ फलदायी मानी जाती है। मान्यता यह भी है कि इस अमावस्या को पितृ अपने प्रियजनों के द्वार पर श्राद्धादि की इच्छा लेकर आते हैं। यदि उन्हें पिंडदान न मिले तो श्राप देकर चले जाते हैं जिसके फलस्वरूप घरेलू कलह बढ़ जाता है व सुख-समृद्धि में कमी आने लगती है और कार्य भी बिगड़ने लगते हैं। इसलिए श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिये।

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