महामीडिया न्यूज सर्विस
आप ही "आनन्द" है...

आप ही "आनन्द" है...

admin | पोस्ट किया गया 23 दिन 13 घंटे पूर्व
30/09/2019
भोपाल (महामीडिया) हमारे जन्म के समय हम कुछ भी न होते हुए भी परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति होते हैं और संभवत: दुखी सम्पूर्ण जीवन में जितना दुलार मिलता है उससे कहीं अधिक था शिशु में हमें प्राप्त होता है। प्रगति संसार का नियम है हम धीरे-धीरे बड़े होते हैं। हमें बोलना नहीं आता तो हमारे चेहरे के हाव- भाव हमारी प्रसन्नता या रूदन को ही हमारी अभिव्यक्ति मान लिया जाता है और उसके अनुसार ही हमारा बचपन गुजरता है। परिवारजन व हमारे आसपास का कोई भी व्यक्ति हो प्रसन्नता से हमें निहारता था और हमारे रोने से वह भी दुखी हो जाता है और येन क्रेन प्रकरेण सभी चाहते हैं कि हमारा रूदन प्रसन्नता में परिवर्तित हो जाये ईश्वर की कृपा से जो हमारे सम्पूर्ण विकास के लिए जो आवश्यक है वे हमें हमारी मां के दूध में पर्याप्त मात्रा में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध होता है। यही तो वह समय है जब हम से हमारा परिचय भी नहीं होता। धीरे-धीरे समय व्ययतीत होता है हम हमारे आसपास के लोगों को, वातावरण व समाज को समझना प्रारंभ करते हैं हमारे शरीर के साथ-साथ हमारे मस्तिष्क का भी विकास होता है। हम बोलना सीख जाते हैं। यह जीवन चलता रहता है परिवार समाज के नियम समझने लगते है हम पढ़ते है समझते है और समझाने लगते हैं, हममें से कुछ दूसरों को और कुछ दूसरों से ज्यादा स्वयं को महत्वपूर्ण मानने लगते। जीवन में प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हो जाती बस ये तेरा है ये मेरा है का बोध हमें होने लगता है। हमें लगता है हम अच्छी स्थिति में आ गये है फिर हमें लगता है अब और अच्छी स्थिति में पहँुचना है और हम उसके लिए पुन: प्रयासरत हो जाते है। झुन-झुने की आवाज को प्रतिस्पर्धा की दौड़ न जाने कब से दबा दिया है इस जीवन कि दौड़ ने कब हमे स्वयं से दूर कर दिया है यह हमें ज्ञात ही नहीं होता और हम स्वयं को महत्व देने कि होड़ में ही लगे रहते हैं। हम यह भी जानते हैं कि यह दौड़ जब समाप्त होगी जब हम स्वयं को इस अन्धी प्रगति और अतृप्त सम्पन्नता से दूर होकर शांति और आनन्द की ओर गतिशील होने का प्रयास करेंगे। ऐसे अनेक लोगों से मिला हूँ जो सामाजिक रूप से बहुत प्रतिष्ठित है किंतु जब उनसे एकांत में चर्चा होती है तो पाता हूँ। कि वह अन्दर से बहुत ही दु:खी है और उन्हें शांति और आनन्द की आवश्यकता है। इन दोनों को छोड़ उनके पास सब कुछ है। क्या सही में उनके पास सब कुछ है? हममें से बहुत से लोगों को लगता है कि अधिक समृद्धि अर्थात् अधिक प्रसन्नता। वह भ्रम में हैं। धन सम्पन्नता होना, आनन्द से सम्पन्न होना नहीं है। आप अपने जीवन के अनेक वसंत पीछे छोड़ आये है। किंतु अभी भी बहुत समय है आपके पास कुछ समय स्वयं के बारे में करने का। सकारात्मक चिंतन करिये, मन कि चंचलता को सकारात्मकता की ओर मोड़ने का प्रयत्न कीजिये प्रात: एंव संध्या 20-20 मिनट भावातीत ध्यान करिये। यह आपको, आपसे सम्पर्क करने में आपका सच्चा मार्गदर्शन सिद्ध होगा। यह आपके पूरे शरीर को संतुलित करेगा। संतुलित मन समस्त कार्यों को सकारात्मकता के साथ करता है। हमें हमारा पी.एम.आर. (प्रोगे्रसिव मसल रिलेक्स) रचनात्मकता को साधना होगा। कुछ समय के लिये ढीले व स्वच्छ वस्त्र पहन कर घर या कार्यालय के शांत स्थान पर आरामदायक मुद्रा में बैठककर गहरी श्वाँस लें, यह विचार करें कि आप जो भी कर रहे हैं क्या वह आपके जीवन मूल्यों से सम्बंधित हैं। जो सफलता आप पाना चाहते हैं वह दूसरों की देखा-देखी या तुलना तो नहीं है। आप वर्तमान को जी रहे हैं या भविष्य के लिये वर्तमान को नष्ट कर रहें है। अपने लक्ष्य तक पहुंचने वाले मार्ग में आप आनंदित हैं? अपने स्वास्थ्य, समय एवं ऊर्जा का सही उपयोग कर रहें हैं। अपनों को समय देते हैं। स्वयं से संतुष्ट हैं, दूसरों से अपेक्षा तो नहीं करते? उपरोक्त प्रश्नों का उत्तर यदि हां है तो निश्चित रूप से आप आनन्दित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। अन्यथा आप जीवन व्यय कर रहे हैं। स्वयं को अतीत और भविष्य से मुक्त कर वर्तमान में लाना ही आनन्द है। भावातीत ध्यान का नियमित अभ्यास आपको आभास कराता है कि आपमें मानवीय ऊष्मा है, आप विकासशील बुद्धिमता और तर्कसंगत आशाओं का संतुलित स्वरूप हैं। आप स्वयं ही आनन्द है।

।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।

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