महामीडिया न्यूज सर्विस
जीवन-मुक्ति

जीवन-मुक्ति

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 42 दिन 18 घंटे पूर्व
01/10/2019
भोपाल (महामीडिया) गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन-मुक्ति के लिये चार मार्गों के विषय में कहा है, ये मार्ग हैं कर्मयोग, सांख्ययोग, ज्ञानयोग और भक्ति (ध्यान) योग। साथ ही मनुष्य अपने जीवन में इन चार पुरुषार्थों के लिये लक्ष्य का निर्धारण करता है, ये हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। मोक्ष का तात्पर्य सभी पुरुषार्थों को वर्तते हुए जीवन के सभी बन्धनों से मुक्त होना, ध्यानयोग मोक्ष के लिए सबसे सरल उपाय है। अतः ध्यानयोग के द्वारा योग की आठवीं अवस्था को प्राप्त करना याने समाधिस्थ होना अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेना है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है "योगस्थ:कुरु कर्माणि" एवं "सहजम् कर्म कौन्तेय" अर्थात कर्मों में कुशलता लाना ही योगस्थ होना है यही सहज योग है।
ध्यानयोग से मनुष्य की जीवन-मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है, अपने स्व की खोज में मनुष्य अनेक रास्तों से जाते हैं, क्रियाशील व्यक्ति कर्म मार्ग से उसका दर्शन करता है, आध्यात्मिक व्यक्ति भक्ति मार्ग से उसे प्राप्त करना चाहता है, जहां उसे अपने इष्ट के प्रति अगाध प्रेम और भक्ति का अनुभव होता है, बुद्धि से युक्त व्यक्ति ज्ञान मार्ग से उसका अनुसरण करता हुआ आत्मा के अस्तित्व को बोधगम्य करता है।
ध्यानी व्यक्ति आत्म तत्व को जानने के लिए ध्यानयोग का अभ्यास करते हैं, जहां वे अपने मन को आनन्दित करके असीम शान्ति एवं दिव्यता का अनुभव करते हैं।
जिस प्रकार वायु तालाब के पानी के ऊपरी सतह को चंचल कर देती है जिससे किनारे लगे वृक्षों की छाया अस्पष्ट हो जाती है, उसी प्रकार चित्त की वृत्तियाँ मन में व्यवधान उत्पन्न करके उसमें निहित आत्मा एवं मन में दूरी पैदा करती हैं।
जिस प्रकार तालाब का स्थिर जल अपने चतुर्दिक सौंदर्य को प्रतिबिंबित करता है उसी प्रकार ध्यानयोग के द्वारा मन समाधिस्थ (भावातीत) होता है तब उसमें आत्म सौंदर्य प्रतिबिंबित दिखाई देता है।
जीवन-मुक्ति के ध्यानयोग मार्ग पर भले ही मनुष्य किसी भी मार्ग को अपनाकर चले तो उसमें स्वतः ही प्रगति के निशान दिखाई देने लगेंगे, जिनमें उत्तम स्वास्थ्य, ज्ञान की अभिवृद्धि, शरीर की निर्मलता, वाणी की दिव्यता, शरीरिक दिव्यगंध एवं तमोगुण से मुक्ति की अनुभूतियों का दर्शन होगा।
भगवान श्रीकृष्ण जी ने 20 आचरणों का वर्णन किया है जिसका पालन करते हुये कोई भी मनुष्य जीवन के समस्त सुखों को भोगते हुए जीवन-मुक्ति "मोक्ष" को प्राप्त कर सकता है।
1- अमानित्वम्:- अर्थात नम्रता,
2- अदम्भितमः- अर्थात श्रेष्ठता का अभिमान न रखना,
3- अहिंसा:- अर्थात किसी जीव को  पीड़ा न देना,
4- क्षान्ति:- अर्थात क्षमाभाव,
5- आर्जवः- मन, वाणी एवं व्यवहार से सरल रहना,
6- आचार्योपासना:- गुरु एवं आचार्य की सेवा निःस्वार्थ भाव से  करना,
7- शौचः- बाहर एवं भीतर की शुद्धि,
8- स्थैर्य:- अर्थात धर्म के मार्ग से विचलित न होना,
9- आत्मविनिग्रहः- इंद्रियों को वश करके अंतःकरण को शुद्ध करना,
10- वैराग्य इन्द्रीयार्थः- लोक एवं परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति न रखना,
11- अहंकारहीनता:- असत्य भौतिक उपलब्धियों का अहंकार न रखना,
12- दुःखदोषानुदर्शनम्:- जन्म, मृत्यु, जरा और रोगादि दुःख में दोषारोपण न करना,
13- असक्तिः- अर्थात सभी प्राणियों में समान भाव रखना,
14- अनभिष्वंगशः- सांसारिक रिश्तों एवं पदार्थों से मोह न रखना,
15- सम चितः- अर्थात सुख-दुःख, हानि लाभ में समान भाव रखना,
16- अव्यभिचारिणी भक्ति:- परमात्मा में अटूट भक्ति रखना एवं सभी जीवों में ब्रह्म के दर्शन करना,
17- विविक्तदेशसेवित्वम:- अर्थात देश के प्रति समर्पण एवं त्याग का भाव रखना,
18- अरतिर्जनसंसदि:- निरर्थक वार्तालाप अथवा विषयों में लिप्त न होना,
19- अध्यात्मज्ञाननित्यत्वम्:- आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहना,
20- आत्मतत्वः- अर्थात आत्मा का ज्ञान होना, यह जानना कि शरीर के अंदर स्थित मैं आत्मा हूँ    शरीर नहीं।
महर्षि जी कहते हैं जीवन-मुक्ति के सम्बन्ध में ऐसी धारणा बन गई है कि त्याग वैराग्य की पराकाष्ठा ही इसका आधार है किन्तु 'जीवन' और 'मुक्ति' इन दो शब्दों का सामान्य अर्थ ही स्पष्ट करता है कि जीवन-मुक्ति का, त्याग और वैराग्य से कोई सम्बन्ध नहीं है। जीवन का लक्षण है कि मन, चित्त, अहंकार एवं इन्द्रियां क्रियाशील रहें और मुक्ति का लक्षण बंधनहीनता अर्थात किसी वस्तु का अनुभव मन को बांध न पाये-मन अपने नित्य स्वरूप में स्थित रहे। अतएव समस्त व्यवहार संपादन करते हुए, अपने सच्चिदानंद स्वरूप में नित्य प्रतिष्ठित रहना ही जीवन-मुक्ति का लक्षण है। इस दृष्टि से प्रवृत्तिमार्गावलम्बी, राग और संग्रह के क्षेत्र में रहता हुआ गृहस्थ भी, 'निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन' के भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश को प्रातः-सायं अपने जीवन में चरितार्थ करता हुआ, अपने मन को भावातीत की सच्चिदानंदमयिता से परिचित कराकर, मन के स्वभाव में सच्चिदानंदमयिता लाकर नित्य अखण्ड रूप से सच्चिदानंद होकर जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति की तीनों अवस्थाओं में यथोचित व्यवहार करता हुआ, जीवन-मुक्ति का आनन्द लेता है। प्रगाढ़ ध्यान की इस सुगम शैली के द्वारा मन सहज ही भावातीत हो जाता है-जीवनमुक्ति का राजमार्ग खुल जाता है। अब जीवनमुक्ति मनुष्य के लिए दुरूह कल्पना की वस्तु नहीं रह गयी। दैनिक जीवन में व्यवहार्य हो गया है-जीवनमुक्ति का सर्वोच्च आदर्श।

आचार्य नारायण दत्त तिवारी 
पूर्व राष्ट्रीय संयोजक एवं प्रशिक्षक-
भावातीत ध्यान एवं सिद्धि कार्यक्रम

और ख़बरें >

समाचार

MAHA MEDIA NEWS SERVICES

Sarnath Complex 3rd Floor,
Front of Board Office, Shivaji Nagar, Bhopal
Madhya Pradesh, India

+91 755 4097200-16
Fax : +91 755 4000634

mmns.india@gmail.com
mmns.india@yahoo.in