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अक्षय फल प्रदान करती है आंवला नवमी

अक्षय फल प्रदान करती है आंवला नवमी

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 11 दिन 9 घंटे पूर्व
01/11/2019
भोपाल (महामीडिया) आंवला नवमी का त्योहार कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अपनी सभी बाल लीलाओं का त्याग करके अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़े थे। इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोकुल का त्याग करके मथुरा की और प्रस्थान किया था। अक्षय नवमी 5 नवंबर को मनाई जायेगी।
अक्षय नवमी पूजा का समय - सुबह 6 बजकर 36 मिनट से दोपहर 12 बजकर 4 मिनट तक (5 नवंबर 2019) 
नवमी तिथि प्रारम्भ- सुबह 4 बजकर 57 मिनट से (5 नवंबर 2019) 
नवमी तिथि समाप्त- अगले दिन सुबह 7 बजकर 21 मिनट तक (6 नवंबर 2019) 
आंवला नवमी का महत्व 
इस त्योहार को अक्षय नवमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व उत्तर भारत और मध्य भारत में मनाया जाता है। आंवला नवमी की पूजा महिलाएं संतान सुख और परिवारिक सुख के लिए की जाती है। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है। 
पुराणों के अनुसार इसी दिन द्वापर युग का प्रारंभ हुआ था। इसके अलावा यह भी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु ने कुष्माण्डक नाम के राक्षस का वध किया था और उसके शरीर से कुष्माण्ड की बेल निकली थी। इसी कारण से इस दिन कुष्माण्ड का दान भी किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार आंवला का वृक्ष भगवान विष्णु का स्वरूप माना गया है। इसके अलावा आंवला, पीपल, वटवृक्ष, शमी, आम और कदम्ब के वृक्ष को चारों पुरुषार्थों को प्राप्त कराने वाला कहा गया है। आंवला नवमी के दिन पूजा करने से गोदान का फल का प्राप्त होता है। 
आंवला नवमी पूजा विधि 
1. आंवला नवमी के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और साफ वस्त्र धारण करती हैं। 
2. इस आंवला के पेड़ की पूजा की जाती है और उसी पास बैठकर भोजन भी किया जाता है। 
3. इसके बाद आंवला के पेड़ के नीचे पूर्व दिशा की और मुख करके बैंठें। 
4. इसके बाद आंवला के पेड़ पर दूध चढ़ाएं और उसके तने पर कच्चे सूत का धागा बांधें और मेंहदी, चूड़ी या सिंदूर आदि किसी भी चीज का चुनाव करके आंवले के पेड़ पर चढ़ाएं। 
5. इसके बाद आंवले के वृक्ष का तिलक करके उसे अक्षत अर्पित करें और धूप व दीप से वृक्ष की पूजा करें। 6. इसके बाद आंवला के वृक्ष की 108 परिक्रमा करें। यदि आप 108 परिक्रमा न कर पाएं तो 8 परिक्रमा करके हाथ जोड़ लें। 
7. इसके बाद आंवला नवमी की कथा ध्यान पूर्वक सुने। 
8. इसके बाद आंवला के वृक्ष के नीचे बैठकर ही भोजन करें और भोजन में आंवले का प्रयोग अवश्य करें। भोजन करते समय अपना मुख पूर्व दिशा की और ही रखें। 
9.आंवला नवमी के दिन किसी ब्राह्मणी औरत को सुहाग का समान, खाने की चीजें और कुछ दक्षिणा दान में अवश्य दें।
10. आवंला नवमी के दिन सोने चांदी का दान करने पर उसका छ: गुना फल मिलता है और यदि संभव हो तो इस दिन सोने और चांदी का दान अवश्य करें। 
आंवला नवमी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वीं का भ्रमण कर रही थीं और वह एक साथ भगवान विष्णु और भगवान शिव की पूजा करना चाहती थी। लेकिन भगवान विष्णु और भगवान शिव की एक साथ पूजा करना असंभव था। तब उन्हें ध्यान आया कि तुलसी और बेल दोनों के ही गुण आंवले में पाए जाते हैं। क्योंकि तुलसी भगवान विष्णु को और बेल भगवान शिव को अतिप्रिय है। इसके बाद माता लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष को भगवान विष्णु और भगवान शिव का प्रतीक मानकर आवंले के वृक्ष पूजा की। आंवले के वृक्ष की पूजा से भगवान विष्णु और भगवान शिव अति प्रसन्न हुए। 
इसके बाद दोनों ने ही माता लक्ष्मी को दर्शन दिए। माता लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर ही भोजन बनाया और भगवान शिव और भगवान विष्णु को भोजन कराया और स्वयं भी आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भोजन किया। जिस दिन माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु और भगवान शिव की आवंले के वृक्ष के नीचे पूजा की थी। वह दिन कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी। तब ही आंवला नवमी का त्योहार मनाया जाता है और आंवले के पेड़ के नीचे ही बैठकर भोजन किया जाता है। यदि ऐसा संभव न हो सके तो इस दिन भोजन में आंवले का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

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