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बाबरी विवाद: SC ने दस्तावेजों के ट्रांसलेशन के लिए 3 महीने का वक्त दिया

बाबरी विवाद: SC ने दस्तावेजों के ट्रांसलेशन के लिए 3 महीने का वक्त दिया

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 70 दिन 16 घंटे पूर्व
11/08/2017
नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट में बाबरी विवाद पर 7 साल बाद शुक्रवार से सुनवाई शुरू हो गई। सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अभी दस्तावेजों का ट्रांसलेशन नहीं हो पाया है, इसलिए इन्हें पेश नहीं किया जा सकता। इस पर कोर्ट ने ट्रांसलेशन के लिए तीन महीने का वक्त दे दिया। इस केस से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज अरबी, उर्दू, फारसी और संस्कृत में हैं। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 5 दिसंबर तय की है। बता दें कि जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर की स्पेशल बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2010 में आए फैसले के बाद, पिछले करीब 7 साल से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है।  शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान सबसे पहले एसोसिएट सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता दलील दीं। उन्होंने सरकार का पक्ष रखते हुए सुनवाई जल्द पूरी करने की मांग की।  इस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड ने ऑब्जेक्शन लिया, कहा कि यह सुनवाई सही प्रॉसेस का इस्तेमाल किए बगैर हो रही है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने सभी पिटीशनर्स से पहले यह स्पष्ट करने को कहा कि कौन किसकी तरफ से पक्षकार है। इसके बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि इस केस से जुड़े कुछ पक्षकारों का निधन हो गया है, इसलिए उन्हें बदलने की जरूरत है। इस मुद्दे ने 1989 के बाद तूल पकड़ा। इसकी वजह से तब देश में सांप्रदायिक तनाव फैला था। देश की राजनीति इस मुद्दे से प्रभावित होती रही है। हिंदू संगठनों का दावा है कि अयोध्या में भगवान राम की जन्मस्थली पर विवादित बाबरी ढांचा बना था।  राम मंदिर आंदोलन के दौरान 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचा गिरा दिया गया था। मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है। 30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस सुधीर अग्रवाल, एसयू खान और डीवी शर्मा की बेंच ने इस मुद्दे पर अपना फैसला सुनाते हुए 2.77 एकड़ विवादित जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था। बेंच ने तय किया था कि जिस जगह पर रामलला की मूर्ति है, उसे रामलला विराजमान को दे दिया जाए। राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़े को दे दी जाए। बचा हुआ एक-तिहाई हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया जाए।
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