महामीडिया न्यूज सर्विस
जान पर भारी मोबाइल गेम्स की लत

जान पर भारी मोबाइल गेम्स की लत

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 69 दिन 22 घंटे पूर्व
12/08/2017
भोपाल.यह केस तो महज एक बानगी है, असल में मोबाइल गेम्स की लत बच्चों व युवाओं की जान पर भारी पड़ रही है। कई बार वे इन गेम्स के इतने आदती हो जाते हैं कि गेम्स के इंस्ट्रक्शन को वे फॉलो करते जाते हैं और उनकी जान पर बन आती है। ब्लू व्हेल, पोकेमॉन जैसे गेम्स दुनियाभर में कई बच्चों से ज्यादा बच्चों की जान ले चुके हैं। मनोचिकित्सकों के पास हर दिन आने वाले 10 केसेस में से करीब 6 केसेस के पीछे की वजह मोबाइल एडिक्शन ही होता है। वहीं एसपी सायबर सेल शैलेंद्र सिंह चौहान ने कहा कि इस तरह के गेम्स को चिह्नित कर जल्द ही बैन कराने का प्रयास करेंगे।
यह हैं लक्षण
- मोबाइल मांगने के अलग-अलग बहाने बनाना
- मोबाइल ना मिलने पर बच्चों का आक्रामक होना
- घर वालों व दोस्तों से अलग मोबाइल के साथ अकेले रहना बच्चों को पसंद
ऐसे बचाएं अपने बच्चों को
- मोबाइल इस्तेमाल में टाइम की पाबंदी बेहद जरूरी
- बच्चा यदि सबसे कटा हुआ, अलग या अकेला रहे तो उसके इस व्यवहार को नजरअंदाज न करें।
इस तरह करते हैं नुकसान
एक्सपर्ट्स के मुताबिक एक खास उम्र खासकर के 15-16 साल की उम्र तक बच्चों को मोबाइल नहीं दें।
मॉनिटरिंग बॉडी नहीं है
एथिकल हैकर योगेश पंडित कहते हैं कि इस तरह के गेम्स के लिए कोई मॉनिटरिंग बॉडी नहीं है जो इन्हें चेक करे। ऐसे में पैरेंट्स को ही ध्यान रखना होगा कि बच्चा क्या डाउनलोड कर रहा है।
आसान विकल्प को चुनते हैं
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. विनय मिश्रा कहते हैं कि सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि बच्चों या युवाओं के लिए यह गेम्स इतने इम्पोर्टेंट कैसे हो गए। इसका कारण है उनका फिजिकल एक्टिविटी और आउटडोर गेम्स में पार्टिसिपेशन नहीं करना।
बॉडी क्लॉक होती है डिस्टर्ब
- पीडियाट्रिक्स डॉ. शीला भम्बल कहती हैं कि इस तरह के गेम्स से बॉडी क्लॉक डिस्टर्ब होती है। फिजिकल और मेंटल ग्रोथ भी बाधित होती है, इसलिए हम उम्र बच्चों के साथ उनका खेलना उनकी सेहत व विकास के लिए बेहद ज्यादा जरूरी हो जाता है।
- गेमर किसी को बताते नहीं कि वे किस लेवल पर पहुंच गए। सारी प्राइवेसी मेंटेन होती है, समय की बाउंडेशन भी नहीं होती है। कभी भी वह गेम खेल सकता है। धीरे-धीरे बच्चा इसी के बारे में सोचता रहता है और सबसे अलग व अपने में खोया-खोया रहने लगता है।
एडिक्शन से हालात खराब
9वीं क्लास के स्टूडेंट सौरभ (परिवर्तित नाम) को मोबाइल गेम्स पोकेमॉन इस कदर पसंद था कि वह रात-रात भर जागकर इसे खेलता। गेम्स के एडिक्श्न के कारण सौरभ की हालत यह हो गई कि रातभर गेम्स खेलने के कारण वह स्कूल नहीं जा पाता। मनोचिकित्सक के पास कई सिटिंग के बाद हैबिट कंट्रोल हुई।
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