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एक ऐसी परंपरा जो देती है पशु संरक्षण का संदेश

एक ऐसी परंपरा जो देती है पशु संरक्षण का संदेश

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 727 दिन 17 घंटे पूर्व
22/08/2017
मप्र - छत्तीसगढ़  एवं महाराष्ट्र का प्रमुख पर्व पोला  हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। खेतों में काम करने वाले किसानो अपने बैलों का साज-श्रृंगार और पूजा-अर्चना कर छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भोग लगाया। बाजार में बच्चों ने मिट्टी के बैलों की पूजा करके चलाने का आनंद उठाया। पोला के अवसर पर पहले बैल सजावट एवं बैल दौड़ मुख्य आयोजन रहता था लेकिन इस तरह आयोजन विलुप्त हो चला है। पहले गेंड़ी नृत्य, गेंड़ी दौड़़, बोरा दौड़, स्लो साइकिल दौड़ व फुगड़ी प्रतियोगता भी आयोजित होती थी। लेकिन आधुनिक संस्कृति ने जब से घरों में अपनी जगह बना ली है ये खेल भी विलुप्ति की कगार पर है।  घर-घर में मिट्टी के खिलौनों की पूजा कर ईष्टदेव से धन-धान्य की प्रार्थना की गई। वहीं बच्चों ने नादिया बैल,पोरा जाता चलाकर खिलौनों का मजा लिया।  मिट्टी से बने नादिया बैल,जाता -पोरा,दिया,चुकी सहित अन्य मिटटी के खिलौनों विधि-विधान से पूजा की गई। चीला रोटी,भजिया जैसे मीठे पकवान भी बनाए गए। पकवानों से मिट्टी के खिलौनों व ईष्टदेव को भोग लगाकर इसका प्रसाद भी बांटा गया। पूजा-पाठ के बाद बच्चे गली-मोहल्लों में नादिया बैल दौड़ाने निकल पड़े। शाम तक यह सिलसिला चला। पोला पर्व के दिन अनेक स्थानों में मिट्टी के खिलौने बिकते रहे। शहरी क्षेत्र में इस त्योहार का उत्साह कम देखने को मिला। त्यौहार के चलते गांव में काम बंद रहा।  पोला त्यौहार के अवसर पर घरों में पारंपरिक पकवान बनाए गए थे। छत्तीसगढ़ी व्यंजन चीला, ठेठरी, खुर्मी, गुलगुला भजिया, गुझिया, पपची, अइरसा समेत अनेक तरह के पकवानों से घर महकते रहे। प्रसाद के रूप में ये पकवान लोगों ने परिवार समेत ग्रहण किया।

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