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आज दशहरा पर्व है

आज दशहरा पर्व है

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 596 दिन 5 घंटे पूर्व
30/09/2017
भोपाल [महामीडिया]: दशहरे का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में भावार्थ है- व्यक्ति की दस प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी को हरने वाला उत्सव। दरअसल, शारदीय नवरात्रों के समापन पर विजयादशमी का पर्व मनुष्य को उसकी इन दस बुराइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। नौ दिन तक व्रत-उपवास, सूक्ष्म व स्थूल कर्मेंद्रियों की शुचिता और आत्म-अनुशासन के माध्यम से विषय-विकारों पर विजय प्राप्ति के उपलक्ष्य में विजयादशमी का आयोजन स्वाभाविक उत्सव बन जाता है। 
हर साल हम रावण, कुंभकर्ण व मेघनाद के पुतलों का दहन करके अपने भीतर रमण करने वाले राम रूपी चैतन्य आत्मा को सहेजने का संकल्प लेते हैं। किंतु हर बार हमारे अंत:करण का एक कोना पारस्परिक-सद्भाव, सहिष्णुता और क्षमाशीलता से वंचित रह जाता है। फिर कोई न कोई बुराई हमारे भीतर दशानन की भांति नया आकार ले लेती है, और अंतर्मन में इन दशाननरूपी विषय-विकारों से संघर्ष शुरू हो जाता है। इसलिए दशहरा मनाने की परंपरा जारी है।  हमारे मनीषियों व महात्मा गांधी जैसे महापुरुषों ने रामराज्य की जो परिकल्पना की थी, उसका अंतिम लक्ष्य मनुष्य के अंदर के रावण को मारना है। किंतु हम भीतर के रावण का वध करने की बजाय बाहर के रावण का दहन करने के प्रति ज्यादा उत्सुक रहते हैं। असलियत में विजयादशमी एक ऐसे मर्यादित पौरुष का उत्सव है जो धर्मांधता व पाखंड का प्रतिरोध करे, जो निर्बल को संबल दे, जो त्याग व करुणा को जीवंत आधार प्रदान करे। 

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