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शरद पूर्णिमा, समुद्र मंथन से इसी दिन हुआ था लक्ष्मी का उदय

शरद पूर्णिमा, समुद्र मंथन से इसी दिन हुआ था लक्ष्मी का उदय

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 686 दिन 12 घंटे पूर्व
01/10/2017
दशहरे के पांचवे दिन शरद पूर्णिमा का उत्सव मनाया जाता है। असल में यह सिर्फ धार्मिक त्योहार ही नहीं है, यह ऋतु परिवर्तन का उत्सव भी है, आध्यात्मिक, औषधिय और रचनात्मक उत्सव भी होता है। वर्षा से शीत की तरफ बढ़ते दिनों का संक्रमण काल हुआ करता है शरद। उसी का उत्सव है शरद पूर्णिमा। अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरह से शरद-पूर्णिमा मनाई जाती है। लेकिन इस सबके पीछे दर्शन मौसम परिवर्तन का ही हुआ करता है।
आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इसे कोजागरी और रास पूर्णिमा भी कहते हैं। किसी-किसी स्थान पर व्रत को कौमुदी पूर्णिमा भी कहते हैं। कौमुदी का अर्थ है चांद की रोशनी। इस दिन चांद अपनी सोलह कलाओं से पूर्ण होता है। कुछ प्रांतों में खीर बनाकर रात भर खुले आसमान के नीचे रखकर सुबह खाते हैं। इसके पीछे यह मान्यता है कि चांद से अमृतवर्षा होती है।
इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं क्योंकि इसी दिन श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ महारास की शुरुआत की थी। इस पूर्णिमा पर व्रत रखकर पारिवारिक देवता की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार समुद्र मंथन से इसी दिन लक्ष्मी का उदय हुआ था। इस दृष्टि से यह लक्ष्मी के आगमन का दिन माना जाता है। इसलिए अधिकतर जगहों पर इस दिन लक्ष्मी की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा पृथ्वी के अत्यंत समीप आ जाता है। कार्तिक का व्रत भी शरद पूर्णिमा से प्रारंभ होता है।
शरद ऋतु में मौसम एकदम साफ रहता है। इस दिन आकाश में न तो बादल होते हैं और न हीं धूल-गुबार। शरण पूर्णिमा की रात में चंद्रकिरणों का शरीर पर पड़ना बहुत शुभ माना जाता है। प्रति पूर्णिमा को व्रत करने वाले इस दिन भी चंद्रमा का पूजन करके भोजन करते हैं।
इस दिन शिव-पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा की जाती है। यही पूर्णिमा कार्तिक स्नान के साथ राधा-दामोदर पूजन व्रत धारण करने का भी दिन है। हिंदू धर्मशास्त्र में वर्णित कथाओं के अनुसार देवी-देवताओं के अत्यंत प्रिय पुष्प ब्रह्मकमल केवल इसी रात में खिलता है।
इस रात को ऐरावत हाथी पर बैठे इंद्रदेव और महालक्ष्मी की पूजा की जाती है। कहीं-कहीं हाथी की आरती भी उतारते हैं। इंद्र देव और महालक्षमी की पूजा में दीया, अगरबत्ती जलाते हैं और भगवा को फूल चढ़ाते हैं। लक्षमी और इंद्र देव रात भर घूम कर देखते हैं कि कौन जाग रहा है और उसे ही धन की प्राप्ति होती है। इसलिए पूजा के बाद रात को लोग जागते हैं। अगले दिन पुन: इंद्र देव की पूजा होती है।

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