महामीडिया न्यूज सर्विस
भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास

भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 716 दिन 16 घंटे पूर्व
06/10/2017
 
भोपाल [महामीडिया] तुलसीदास जी का अविर्भाव जिस समय हुआ था, वह समय हिन्दू जाति के लिए महान संकट का था। चंहु ओर अंधकार ही नज़र आ रहा था, कोई मार्ग नहीं सूझ रहा था। तुलसीदास जी ने भगवान का लोकमंगल रूप दिखाकर हिन्दू जाति के अंधेरे भविष्य में आशा का नव प्रकाश आलोकित किया।
बाँका जिले के राजपुर नामक ग्राम में आत्माराम दुबे सरयू पारीण प्रतिष्ठित ब्राह्मण रहते थे उनकी धर्मपत्नी का नाम तुलसी था। उनके यहाँ विक्रम संवत 14 की श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन बारह महीने गर्भ में रहने के पश्चात् तुलसीदास जी का जन्म हुआ। जन्म के समय बालक तुलसीदास आम बच्चों की भाँति रोए नहीं बल्कि इनके मुख से ??राम?? निकला। उनके मुख में पूरे दांत मौजूद थे उनका शरीर पाँच वर्ष के बालक के समान था। इस प्रकार के अद्भुत बालक का जन्म सुनकर उनके पिता अमंगल की शंका से भयभीत हो गये।
माता तुलसी ने बालक के अनिष्ट की आशंका से दसमी की रात्रि को अपनी दासी चुनियाँ के साथ उसके ससुराल भेज दिया और दूसरे दिन संसार से चल बसी। तुलसीदास जब साढ़े पाँच वर्ष के हुए तब चुनियाँ का देहान्त हो गया। अब तुलसीदास अनाथ हो गये और घर-घर भटकने लगे। इस पर माता पार्वति को बालक पर दया आई तो वे ब्राह्मणी का भेष बनाकर बालक के पास जातीं और अपने हाथ से भोजन करा जाती।
इधर भगवान शंकर की प्रेरणा से जो नरहर्यानन्द जी ने इस बालक को ढूंढ निकाला  और उसका नाम रामबोला रखा। वह उसे अयोध्या ले गये और यहाँ विक्रमी संवत 1561 माद्य शुक्ल पंचमी शुक्रवार को यज्ञोपवीत संस्कार कराया। बिना सिखाये बालक रामबोला ने गायत्री मंत्र का उच्चारण किया। इसके बाद नरहरि स्वामी ने बैष्णवों के पाँच संस्कार करके राम बोला को राम मंत्र की दीक्षा दी। बालक रामबोला की बुद्वि बड़ी प्रखर थी। कुछ दिन बाद गुरू शिष्य दोनों सूकर क्षेत्र गंगातर पहुंचे। वहाँ नरहरि जी ने बालक रामबोला को श्री राम कथा सुनाया। इसके पश्चात् कुछ दिन बाद काशी चले गये।
विक्रम संवत 1573 ज्येष्ठ शुक्ल 13 गुरूवार को भारद्वाज गोत्र के दीनबंधु पाठक की कन्या रत्नावली के साथ उनका विवाह हुआ और वह सुखपूर्वक अपनी धर्म पत्नी के साथ रहने लगे। एक बार उनकी स्त्री अपने भाई के साथ पीहर चली गई तुलसीदास जी को जब पत्नी के जाने का पता लगा तो वह उसके पीछे-पीछे वहाँ चले गये जिसकी उनकी पत्नी को बड़ी लज्जा आई और उसने कहा-
लाज न आवत आपको, दौरे आहु साथ।
धिक-धिक ऐसे प्रेम को, कहा कहूँ मैं साथ।।
अस्थि चर्यमय देह यह, तासो जैसी प्रीति।
तैसी जौ श्री राम तै, होति न तो भवभीति।।
बस ये शब्द तुलसीदास जी को बाण की तरह लग गये, वैराग्य मार्ग पर घसीट कर ले गये, उनके हृदय कपाट खुल गये और उन्होंने भगवान श्री राम के चरणों में चित्त को लगाने का निर्णय लेकर संसार से नाता तोड़ दिया।
काशी में हनुमान जी से यह जानकर कि भगवान राम के दर्शन चित्रकूट में होंगे वे चित्रकूट पहुँच गये। उन्होंने राम घाट पर अपना आसन जमाया। एक दिन प्रदिक्षणा के वक्त उन्हें भगवान श्री राम के दर्शन हुए। तुलसीदास जी ने देखा कि दो बड़े ही सुंदर राजकुमार घोड़ों पर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदास जी मुग्ध हो जब पीछे से आकर हनुमान जी ने सारा भेद बताया वो यह पश्चाताप करने लगे। श्री हनुमान जी ने उन्हें सांतव्ना देते हुए कहा कि प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे। विक्रम संवत 1607 मौनी अमावस्या बुधवार को उनके सामने भगवान श्री राम पुनः प्रगट हुए। श्री राम ने बालक रूप में तुलसीदास जी से कहा- बाबा हमें चंदन दो। श्री हनुमान जी ने सोचा तुलसीदास जी इस बार भी धोखा न खा जायें इसलिए तोेता का रूप धारण कर उन्होंने कहा-
चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसे तिलक करे रघुबीर।
तुलसीदास जी अद्भुत छबि को देखकर शरीर की सुध भूल गये। भगवान ने अपने हाथ से तुलसीदास जी के मस्तक पर चंदन लगाया और अंर्तध्यान हो गये।
विक्रम संवत 1627 में श्री हनुमान जी की आज्ञा से तुलसीदास जी अयोध्या की ओर चल पड़े। वहाँ उनके अंदर कवित्व शक्ति का स्फुरण हुआ और संस्कृत में रचना रचने लगे। किन्तु दिन में जितने पद रचते रात्रि को सभी लुप्त हो जाते। आठवें दिन उन्हें स्वप्न में आदेश मिला- तुम अपनी भाषा में काव्य रचना करो। तुम्हारी कविता सामवेद की तरह फलवती होगी। तुलसीदास जी उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर काशी आ गये।
विक्रम संवत 1631 में रामनवमी की प्रातः से तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस की रचना प्रारंभ की। दो वर्ष, सात महीना, पच्चीस दिन में ग्रंथ की समाप्ति हुई। विक्रम संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की पंचमी को श्री रामविवाह के दिन सातों कांड पूर्ण हो गये। इसके पश्चात् तुलसीदास जी काशी चले गये और उन्होंने भगवान विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णा को श्री रामचरित मानस सुनाया। कुछ पंडितों ने ईष्र्यावश श्री मधुसूदन सरस्वती को पुस्तक देखने को कहा। श्री स्वामी जी ने पुस्तक देखकर लिखा- इस काशी रूपी आनन्द भवन में तुलसीदास चलता फिरता तुलसी का पौधा है, उसकी कविता रूपी मंजरी बड़ी ही सुंदर है, जिस पर श्री राम रूपी भंवरा सदा मंडराया करता है। 
तुलसीदास जी काशी में अस्सीघाट पर रहने लगे, रात्रि को एक दिन कलियुग मूर्तिमान होकर प्रकट हुआ और त्रास देने लगा। गोस्वामी जी ने हनुमान् जी का ध्यान किया। हनुमान् जी ने उन्हें विनय के पद रचने को कहा, इसके बाद ही गोस्वामी जी ने विनय पत्रिका लिखी, और भगवान के श्री चरणों में रख दी, भगवान ने अपने हस्ताक्षर करके तुलसीदास जी को निर्भय बना दिया। 
विक्रमी संवत् 1680 श्रावण शुक्ल सप्तमी को गंगा किनारे अस्सी घाट पर राम राम कहते अपने शरीर को त्याग दिया।
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