महामीडिया न्यूज सर्विस
चैतन्य महाप्रभु

चैतन्य महाप्रभु

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 715 दिन 19 घंटे पूर्व
07/10/2017

भोपाल [महामीडिया] समय समय पर धर्म की अवनति होने पर कोई न कोई महात्मा अवतीर्ण होकर सदुपदेश आदि अनेक उपयों से धर्म का संस्थापन करते हैं। चैतन्य देव भी ऐसे ही अद्वितीय प्रचारक हुए हैं। श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु का जन्म शक संवत 1407 में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को सिंह लग्न में चंद्रग्रहण के दिन पश्चिमी बंगाल के नवद्वीप नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री जगन्नाथ मिश्र और माता का शचि था। ये श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त थे। नवद्वीप के लोगों का ऐसा विश्वास है कि डाकिनी, शाकिनी, आदि बालक का अनिष्ट किया करती हैं किन्तु निमाई नारम रखने से वे बालक का कुछ भी नही बिगाड़ सकती, इसलिए उनका नाम ??निमाई?? रख दिया गया। 
निमाई बाल्यावस्था में कुछ चतुर और क्रोधी थे। वे जो कुछ कहते थे उसे पूरा न कर सकने पर रो रो कर घरवालों को परेशान कर डालते थे। किन्तु यदि कोई मधुर स्वर से हरिगुण गाने लगता था तो उसका रोना बंद हो जाता था और वे अपने नन्हे-नन्हे हाथ पैरों को हिलाकर हृदय का आनंद प्रगत करते थे। 
एक दिन एक ब्राह्मण जगन्नाथ मिश्र के घर अतिथि हुए वे गोपाल मन्त्र से दीक्षित थे। जैसे ही उन्होंने भोजन बनाकर इष्टदेव के ध्यान के लिए नेत्र बंद किये वैसे ही निमाई ने आकर एक-एक ग्रास उठाकर खा लिया। शचि और जगन्नाथ मिश्र दूर से यह देखकर हाय-हाय करते हुए दौड़े आये। बहुत अनुनय एवं विनय के बाद ब्राह्मण दूसरी बार भोजन बनाने को तैयार हुए।
न्याय शास्त्र पढ़ने की इच्छा से नवदीप के प्रधान नैयायिक वासुदेव सार्वभौम की चतुष्पाठी में विद्याध्ययन करते थे। उस समय रघुनाथ ने ??दीधिति?? लिखना प्रारंभ किया था। चैतन्य भी न्याय का कोई ग्रंथ लिख रहे थे, दोनों में मित्रता थी। अब उन्होंने मुकुन्द, संजय के बड़े चण्डीमण्डप में स्वयं एक चतुष्पाठी खोली। इनकी असाधारण शास्त्र दक्षता की बात किसी से छिपी न थी अतः इनकी चतुष्पाठी में प्रतिदिन छात्रों की संख्या बढ़ने लगी जिससे शचि को अर्थ का संकट भी नहीं रहा। एक बार केशव भारती नामक एक दिग्विजयी कश्मीरी पंडित नवदीप में आये, उन्होंने वहां के सब पंडितों को परास्त कर दिया लेकिन चैतन्य ने उनके द्वारा बनाये गये एक श्लोक में अलंकारिक दोष बताकर उनके गर्व को चूर्ण किया तो वे चैतन्य के हाथों द्वारा तिरस्कृत होकर दण्डी स्वामी हो गये। चैतन्य ने कषाय वस्त्र धारण किये और भारती ने उनके कान में मंत्र दिया फिर उनका नाम श्री कृष्ण चैतन्य रखा। अब केषव भारती का दिया हुआ दण्ड कमंडल लेकर चैतन्य देव सबसे विदा माँग कर बोले- अब मैं अपने प्राणनाथ के पास वृंदावन जा रहा हूँ। प्राणवल्लभ मैं आ रहा हूँ कहते हुए चैतन्य देव पश्चिम की ओर दौड़ने लगे। देखते-देखते चैतन्य ने जंगल में प्रवेश किया और अदृश्य हो गये। शांतिपुर में कुछ दिन आचार्य रत्न अद्वैताचार्य के घर रहने के पश्चात् चैतन्य ने भक्तों से कहा सन्यासी को एक स्थान पर बहुत समय तक रहना उचित नहीं होता। मैं अन्यत्र जाऊंगा, तुम लोग कृष्ण अराधना और कृष्ण कथा कहते हुए समय बिताओ। माता की सहमति से निश्चय हुआ कि निमाई नीलांचल में रहेंगे। कमलपुर में कपोतेश्वर के दर्शन के उपरांत चैतन्य जगन्नाथ जी के दर्शन को चल दिये। वह चैतन्य मंदिर के शिखर को देखकर ही उन्मुक्त हो गये और दंडवत कर नृत्य करने लगे इसी प्रकार नाचते, गाते और रोते वे अठारह नाले पार कर आये अब चैतन्य को ब्रह्मज्ञान हुआ। अरूणोदय के समय चैतन्य देव जगन्नाथ जी के दर्षन करके पुजारी द्वारा दी हुई माला और महा प्रसाद लेकर वेदान्ती पंडित सार्वभौम भट्टाचार्य के घर आये। चैतन्य ने उन्हें महाप्रसाद दिया उन्होंने बिना किसी संकोच के उसे तुरंत खा लिया। बैषाख मास के प्रांरभ में चैतन्य देव ने भक्तों से कहा कि अब में मति कृष्णदास के साथ दक्षिण यात्रा को जाऊंगा। अलालनाथ मंदिर जो पुरी से चार कोस दक्षिण में है के दर्शन
करके वे कीर्तिन करने लगे। प्रातःकाल होने पर नित्य कर्म से निवृत होकर चैतन्य सबसे विदा लेकर आगे चल दिये। उनके पीछे-पीछे कृष्णदास जल पात्र लेकर चले। चैतन्य ने दक्षिण की ओर जाते हुए गौतमी गंगा में स्नान किया। और मल्लिकार्जुन तीर्थ महादेव के दर्शन किये। एक दिन चैतन्य गरूड़स्तम्भ के पास खड़े होकर जगन्नाथ जी के दर्शन कर रहे थे, उसी समय भीड़ में दर्शन न मिल सकने के कारण एक स्त्री उनके कंधे पर पैर रखकर गरूढ़ पर चढ़कर दर्शन करने लगी। पास ही खड़े शिष्य चिल्ला उठे। चैतन्य ने उन्हें रोक कर कहा- इसके समान भाग्यवती स्त्री कोई नहीं है, भगवान ने इस पर कृपा की है। इसलिए ब्रह्म ज्ञान शून्य होकर यह ऊपर चढ़ी जगन्नाथ जी के दर्शन कर रही है। स्त्री के नीचे उतरने पर प्रभु ने उसकी पद वंदना की।
कृष्णदास ने अपने सूत्राध्याय में लिखा है कि शक संवत 1407 के फाल्गुन मास में चैतन्य का जन्म हुआ। 24 वर्ष गृहस्थाश्रम में रहने के पश्चात् सन्यास ग्रहण कर दस वर्ष पर्यटन में बिताये। इसके पश्चात् 18 वर्ष नीलांचल में रहकर लोक शिक्षा और धर्म प्रचार करते हुए शक संवत 14 में 48 वर्ष की आयु में महाप्रभु अंतर्हित हुए। श्रीकृष्ण चैतन्य चैतन्य संप्रदाय के प्रर्वतक थे और अद्वैताचार्य तथा नित्यानन्द उनके प्रधान सहकारी थे। उन्होंने भ्रमण करते-करते कीर्तन किया और अपने मत का प्रचार किया। नाम संकीर्तन इस संप्रदाय का प्रधान साधन है। 
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