महामीडिया न्यूज सर्विस
संत तुकाराम

संत तुकाराम

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 792 दिन 19 घंटे पूर्व
10/10/2017
भोपाल(महामीडिया) महाराष्ट्र के प्रसिद्व संत तुकाराम का जन्म पूना जिले के देहू गांव में विक्रम संवत 1665 में हुआ था। इनके पिता का नाम बोतहोबा और माता का नाम कनकाई था। संत तुकाराम ने पांडुरंग भगवान की भक्ति बाल्यावस्था से की थी और उनके भजन गाया करते थे। इनकी दो पत्नियाँ थी एक का नाम रघुबाई और दूसरी का नाम जीजाई था। इन्होंने अपने पिताजी का व्यापार भलि-भांति सम्भाल लिया और चार वर्षों तक व्यापार का कार्य अच्छी तरह चला। लेकिन भगवान की इच्छा तुकाराम को संसार के बंधन से मुक्त करके अन्य लोगों के उद्वार में लगाने की थी। इसके कारण उनके ऊपर एक के बाद एक विपत्ति डालना प्रारंभ कर दिया। 17 वर्ष की उम्र में इनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया। इनके भाई विरक्त होकर यात्रा करने निकल गये और बाकी का जीवन सत्संग तथा आत्मचिंतन में व्यतीत किया।
इन घटनाओं से तुकाराम जी को बड़ा आघात लगा और सांसरिक कार्यों से इनका मन रूष्ट हो गया। व्यापार में भी नुकसान होने लगा और कुछ समय पश्चात उदर पूर्ति के भी लाले पड़ गये। पैसा पास में नहीं रहा और कोई उधार भी नहीं देता था। सभी कहते थे तुम हर समय ??विट्ठल?? नाम लिया करते हो इसलिए तुम्हारे ऊपर कष्ट आते हैं। इसी समय पूना जिले में भयंकर अकाल पड़ा जिसने तुकाराम जी की पहली पत्नी और प्रथम पुत्र संतोबा का देहान्त हो गया। माता-पिता, पत्नी और पुत्र के मरने के पश्चात भी तुकाराम कहते- विट्ठल मेरा तो तुम से कार्य है, दूसरे की मुझे आवश्यकता नहीं। संत तुकाराम भीम नाथ की पहाड़ी के ऊपर पंद्रह दिन एकांतवाष करके भगवान के ध्यान में तल्लीन रहे और उनका साक्षात्कार किया। भगवान पांडुरंग ने बालाजी चैतन्य रूप में आकर स्वप्न में दर्शन दिये और विक्रम संवत 1689 में बालाजी चैतन्य से तुकाराम जी ने दीक्षा ग्रहण की। तुकारामजी अपने अनुभव से कहते हैं ?नाम के स्मरण में वह शक्ति है कि अदृश्य भी दिख जाता है और न समझने वाला भी समझ में आ जाता है।? अबोल को वाचा मिल जाती है और सभी लाभ घर बैठे ही मिल जाते हैं। तुकाराम कर्मयोगी और ज्ञानी थे इसलिए इनके वाणी में प्रेमरस भरा हुआ था। छत्रपति शिवाजी को भी राजनीति पर तुकाराम जी ने उपदेश दिया था।
तुकाराम जी का उपदेश था-दूसरों के ऊपर उपकार करना ही पुण्य है। मुख से भगवान का नाम लेना ही सबसे बड़ा लाभ है। समस्त में भगवान को देखना ही ईश्वर दर्शन है और अहंभाव ही अदर्शन ज्ञान है। हरि का दास वहां है जो सब कुछ भगवान को अर्पण कर देता है वही उद्वार है और जो अंदर मलिनता रखता है वही कंजूस है।
तुकाराम जी ने सदेह बैकुंठ में जाने का निश्चय किया था। विक्रम संवत 1706 की चैत्र कृष्ण द्वितीया दिन शनिवार सूर्योदय के पश्चात 41 वर्ष की उम्र में तुकाराम ने प्रयाण किया। दूज के दिन अंर्तध्यान हुए, पंचमी को इनका करताल, तंबूरा, और कम्बल मिला। इसी समय से प्रतिवर्ष इनके जन्म स्थान देहू में चैत्र कृष्ण दूज से पंचमी तक बड़ी धूमधाम से महोत्सव मनाया जाता है। 
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