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दिया तले अंधेरा!

दिया तले अंधेरा!

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 580 दिन 2 घंटे पूर्व
16/10/2017
जहाँ योग्यता, न्याय और सुविचार होना चाहिए वहाँ अयोग्यता, अन्याय और कुविचार होता है जिस प्रकार दिया प्रकाश देता है पर उसके नीचे के हिस्से में अँधेरा होता है।  यहां यह बात दीपावली में हम सब के लिए दिये बनाने वाले कुम्हारों  पर सटिक बैठती है। दिवाली में कुम्हारों द्वारा बनाए गए दिये से ही हमारे घर रोशन होंगे। पूजा?पाठ, अनुष्ठान, मांगलिक कार्यक्रम हो या फिर अंतिम संस्कार, मिट्टी के बने पात्रों के बिना कोई भी कार्य पूरा नहीं होता। छत्तीसगढ़ में मिट्टी के पात्र बनाने के व्यवसाय में लगे प्रदेश के 30 हजार से अधिक कुम्हारों की जिंदगी दिया तले अंधेरा की कहावत को चरितार्थ कर रहा है। शासन द्वारा घोषणा के 11 वर्ष बाद न तो प्रदेश के कुम्हारों को मिट्टी के लिए जमीन नसीब हुई और न ही मिट्टी के बर्तन को पकाने लकड़ी या भूसे की व्यवस्था है। दिये बनाने वाले कुम्हारों की जिंदगी बगैर सरकारी मदद के बद से बत्तर होती जा रही है। मिट्टी की अनुपब्लधता और लकड़ी की कमी के कारण व्यवसाय बदं होने की कगार पर है। राजधानी रायपुर हो या दुर्ग, बिलासपुर, राजनादगांव या प्रदेश के अन्य जिले, हर जगह कुम्हारों की जिंदगी लगभग एक जैसी ही है। दुर्ग जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर कुम्हारों के गांव सिरसा खुर्द के युवा 19 वर्षीय चुम्मन कुंभकार कहते हैं कि दिवाली में​ आॅर्डर रहता है। इसलिए दिया बनाने में परिवार वालों की मदद करता हूं। साल के बाकि समय रोजी?मजदूरी कर ही जीवन यापन चलता है। क्योंकि मिट्टी के बने बर्तन की मांग दिन प्रतिदिन कम होती जा रही है।सिरसा खुर्द की 40 वर्षीय महिला दुलारी कहती हैं कि दाई मरे, ददा मरे, रोजगार झन मरे। इसलिए ही अपने पूर्वजों से वरासत में मिले इस रोजगार को अब भी कर रहे हैं। इससे सिर्फ इतना ही खर्च निकल पाता है कि घर में सबको भरपेट खाना मिल सके। बाकि बच्चों की पढ़ाई सहित अन्य खर्चे इस व्यावसाय से वहन नहीं किए जा सकते। आपको बता दें कि छत्तीसगढ़ी भाष में मां को दाई व पिता को ददा भी कहते हैं।राजधानी रायपुर के कुम्हार प्रहलाद चक्रधारी ने बताया कि प्रदेश के कुम्हारों को वर्ष?2006 में हुए सिरसा?खुर्द अधिवेशन में मिट्टी के लिए प्रत्येक गांव में 5-5 एकड़ जमीन देने घोषणा सरकार द्वारा की गई थी। प्रदेश के ​मुखिया डॉ। रमन सिंह द्वारा की गई इस घो​षणा को अब तक अमल में नहीं लाया जा सका है।नंदकुमार चक्रधारी बताते हैं कि मिट्टी के कच्चे बर्तनों को पकाने के लिए पर्याप्त मात्रा में लकड़ी व भूषा नहीं मिलने के कारण लोग इस व्यवसाय से किनारा कर रहे हैं। व्यवसाय तो चौपट हो ही रहा है साथ ही बच्चों का भविष्य भी अंधकार में जा रहा है।

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