महामीडिया न्यूज सर्विस
देउठनी एकादशी कल

देउठनी एकादशी कल

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 663 दिन 3 घंटे पूर्व
30/10/2017
भोपाल (महामीडिया) भगवान विष्णु कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे देवउठनी एकादशी कहते है चार महीने तक सोने के बाद इस दिन जागते हैं। भगवान विष्णु के जागने के साथ ही इस दिन  माता तुलसी का विवाह होता है, जिसे देवउठनी एकादशी को तुलसी विवाह उत्सव भी कहा जाता है। यह एकादशी दिवाली के 11 दिन बाद आती है। मान्यता के अनुसार, कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन तुलसी जी और भगवान विष्णुजी का विवाह कराने की परंपरा होती है। इस बार तुलसी विवाह 31 अक्टूबर को है जिसमे तुलसी के पौधे और विष्णु जी के स्वरूप शालिग्राम के साथ विवाह कराया जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति तुलसी के साथ शालिग्राम का विवाह करवाता है उनके दांपत्य जीवन में आपसी प्रेम बना रहता है और मृत्यु के पश्चात उत्तम लोक में स्थान मिलता है। एक समय जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर हुआ। इसका विवाह वृंदा नामक कन्या से हुआ। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। इसके पतिव्रत धर्म के कारण जलंधर अजेय हो गया था। इसने एक युद्ध में भगवान शिव को भी पराजित कर दिया। अपने अजेय होने पर इसे अभिमान हो गया और स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गये और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे। भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलांधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गयी और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे अतः वृंदा के शाप को जीवित रखने के लिए उन्होनें अपना एक रूप पत्थर में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी। तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।
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