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सांस्कृृतिक महोत्सव के कारण बर्बाद हुए यमुना के तट ?

सांस्कृृतिक महोत्सव के कारण बर्बाद हुए यमुना के तट ?

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 190 दिन 14 घंटे पूर्व
13/04/2017
 नई दिल्ली। श्री श्री रविशंकर की ओर से पिछले साल यमुना के तट पर आयोजित तीन दिन के 'विश्व संस्कृति उत्सव' की वजह से यमुना के जल भराव वाले इलाके को भारी नुकसान पहुंचा है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) की ओर से इस मामले में गठित की गई समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सांस्कृृतिक महोत्सव के कारण बर्बाद हुए यमुना के डूब क्षेत्र के पुनर्वास में 42.02 करोड़ रुपए का खर्च आएगा और दस साल का समय लगेगा। समिति ने सुझाया है कि पुनर्वास योजना के दो भाग हैं-भौतिक और जैविक।
इनमें क्रमशः 28.73 करोड़ रुपए और 13.29 करोड़ रुपए का खर्च आएगा। केंद्रीय जल संसाधन सचिव शशि शेखर के नेतृत्व में गठित विशेषज्ञ समिति ने एनजीटी को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इस कार्यक्रम ने यमुना तट को ऐसा नुकसान पहुंचाया है जिसे सुधारने में कम से कम दस साल का समय लगेगा।
रिपोर्ट में कहा गया है कि यमुना के पश्चिमी तट के तीन सौ एकड़ के इलाके और पूर्वी तट के 120 एकड़ इलाके की पारिस्थितिकी को पूरी तरह नष्ट कर दिया गया है। अपनी 47 पन्नों की रिपोर्ट में इसने कहा है कि जलभराव वाले इलाके में प्राकृतिक रूप से मौजूद रहने वाले जीव-जंतु और पादप समाप्त हो गए। नदी के इस तटीय इलाके में बड़ी तादाद में छोटे-बड़े ग़ड्ढे थे।
इनमें पानी और कीचड़ में पनपने वाले कई तरह के छोटे-बड़े पौधे और जीव मौजूद रहते थे। इसके अलावा कई तरह की छोटी-बड़ी घास और पौधे भी यहां विशेष तौर पर उपलब्ध थे। मगर आयोजन के लिए जिस तरह पूरे इलाके को समतल किया गया उससे यह सब समाप्त हो गया। दुनिया में सबसे अधिक कलाकारों की एक साथ प्रस्तुति का रिकॉर्ड बनाने के लिए तैयार किए गए बेहद विशाल मंच को खड़ा करने के लिए खास तौर पर बाहर से बहुत सा मलबा ला कर यहां डाला गया था।
इसी तरह मुख्य सड़कों से कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में मलबा डाल कर रास्ता तैयार किया गया था। इन सबने यहां के जीव-जंतुओं और पादपों को तहस-नहस कर दिया है।
पिछले साल श्री श्री रविशंकर के संगठन आर्ट ऑफ लिविंग ने इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम का आयोजन किया था। तीन दिन के इस कार्यक्रम में देश-विदेश के लाखों लोगों ने हिस्सा लिया था। हालांकि इस आयोजन के पहले ही एनजीटी ने एतराज किया था। लेकिन तब सारी तैयारियां हो चुकी होने की वजह से पांच करोड़ रुपए की शुरुआती मुआवजे की रकम जमा करवा कर कार्यक्रम को अनुमति दे दी गई थी। इसके बाद एनजीटी ने कार्यक्रम की वजह से हुए पर्यावरण को नुकसान के आकलन के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी।

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