महामीडिया न्यूज सर्विस
असंक्रामक रोग भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती

असंक्रामक रोग भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक चुनौती

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 367 दिन 9 घंटे पूर्व
17/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा इस रोग के निरोधक और उपचारात्मक दोनों पहलुओं के बारे में अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य संबंधी सूचना और अनुमानों के आधार पर व्यवस्थित प्रचार किया गया, जो इस बीमारी को सीमित करने और काफी हद तक पलटने में सक्षम रहा। इन उपलब्धियों की खुशियां मनाना जल्दबाजी होगी, क्योंकि इनकी स्थिति अभी नाजुक है और इन्हें आसानी से आघात पहुंच सकता है लेकिन सिर्फ इस बात की तुलना की जा सकती है कि इस बीमारी ने उप-सहारा अफीका में क्या रूप लिया और यह आकलन किया जा सकता है कि हम वैसी स्थिति से बाल-बाल बचने में कितने भाग्यशाली रहे हैं। पोलियो के विरूद्ध मिली एकमात्र कामयाबी इस अवधि की एक अन्य उपलब्धि है लेकिन यहां चुनौती प्रचार प्रणाली और लाभ बरकरार रखने की बढ़ती लागत से बाहर निकलने की है। कुष्ठ रोग में आई महत्वपूर्ण कमी के बारे में बहुत कम टिप्पणियां की गई हैं लेकिन वह समान रूप से प्रभावशाली है इस बीमारी का प्रचलन उन्मूलन को परिभाषित करने के कगार से भी कम हो चुकी है। इस रोग के संबंध में भी, कार्यक्रम के तहत स्पष्ट रणनीति बनाने की जद्दोजहद की जा रही है जो इसके नए मामलों और इससे होने वाली अक्षमताएं रोक सके, जो इसके उन्मूलन के बाद भी कई वर्षों तक प्रकट होती रहेंगी। मच्छर के काटने से होने वाली बीमारियों पर नियंत्राण की दिशा में मिली-जुली प्रगति हुई है। फाइलेरिया में अच्छी कमी आई है और एलिपफन्टाइअसिस या फीलपांव नए मामले बहुत कम सामने आ रहे हैं। मलेरिया में भी पर्याप्त कमी आई है और कई तरह के साधनों की उपलब्धता से यह भरोसा होने लगा है कि मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम की राह अपनाई जा सकती है। संभवतः यह ऐसा रोग है जो 10 से 15 वर्षों में उन्मूलन की कगार तक पहुंच सकता है। काला-अजार पुराने समय का रोग है। अब तक इसका उन्मूलन हो जाना चाहिए था। इसकी अंतिम सीमा बार-बार बदली जाती रही है। दो-तीन राज्यों के कुछ अंदरूनी हिस्सों में यह रोग अब तक मौजूद है, और इससे छुटकारा पाने के लिए किए जा रहे समस्त प्रयासों को नकार रहा है। चार राज्यों में हर साल इस रोग के लगभग 20,000 मामले सामने आते हैं लेकिन इसके सबसे ज्यादा मामले बिहार में होते हैं। इस बीच मच्छर के काटने से होनी वाली नई बीमारियां सामने आई है-विशेषकर डेंगू और चिकनगुनिया। अच्छी खबर यह है कि इन दोनों से होने वाली मौतों में कुल संख्या में और सभी मौतों के अनुपात दृष्टि से, और यहां तक कि सभी मामलों की दृष्टि से व्यापक कमी आई है। राष्ट्रीय रोग नियंत्राण कार्यक्रमों में सबसे ज्यादा चिंता तपेदिक को लेकर है। इस रोग से होने वाली मौतों में पर्याप्त कमी आने के बावजूद, इसके नए मामलों की तादाद में ज्यादा कमी नहीं आई है और मल्टी-ड्रग प्रतिरोधी टीबी के मामले अब ज्यादा से ज्यादा राज्यों में बढ़ रहे हैं। हालांकि इन राष्ट्रीय रोग नियंत्राण कार्यक्रमों के अंतर्गत सभी रोगों से होने वाली मौतों की संख्या समस्त मौतों के 6 प्रतिशत से भी कम है। संक्रामक रोगों के कारण होने वाली ज्यादातर मौतों की वजह विशेषकर बच्चों में अतिसार, डायरिया और श्वास संबंधी संक्रमण और कई अन्य रोगाणु हैं, जो उतने संक्रामक तो नहीं हैं लेकिन वे व्यापक रूप से प्रबल है। कुल मौतों में से करीब 30 प्रतिशत मौतों की वजह अभी तक समस्त संक्रामक रोग ही हैं। ज्यादा और बढ़ते अनुपात में होने वाली मौतों की वजह असंक्रामक रोग के लिए उत्तरदायी हैं। अनुमान है कि चार प्रमुख एनसीडी में से एक की वजह से सर्वाधिक उत्पादक वर्षों के दौरान 26 प्रतिशत तक मौते हो सकती हैं। इसकी गंभीरता को समझने के लिए इसकी तुलना स्वीडन से करनी होगी, जहां तुलनात्मक संख्या 10 है, ब्रिटेन, जहां यह तादाद 12 होगी, थाईलैंड, जहां यह संख्या करीब 17 होगी। इसे अन्य तरीके से कहें तो भारत में मुख्य एनएसडी के कारण 62 प्रतिशत पुरुषों की मौते 70 साल की आयु से पहले हो सकती हैं, जबकि इसके मुकाबले स्वीडन में यह तादाद सिर्फ 24 प्रतिशत, ब्रिटेन में सिर्फ 29 प्रतिशत और थाईलैंड में 45 प्रतिशत होगी। महिलाओं के संदर्भ में भी यही अनुपात है। महिलाओं में लगभग 52 प्रतिशत मौते एनएसडी के कारण 70 साल की आयु से पहले होती हैं, जबकि इसके मुकाबले स्वीडन में सिर्फ 15 प्रतिशत मौते होती हैं। आयु मानकीकृत मृत्यु दर की भी यही स्थिति है। भारत में 4 प्रमुख एनएसडी के कारण प्रति 100,000 पर लगभग 785 पुरुषों की मौत हो सकती है जिनमें से कैंसर के कारण लगभग 80, मधुमेह के कारण 30, पुराने श्वसन रोगों के कारण 189 और हृदय रोग के कारण 349 मौते हो सकती हैं। स्वीडन में कैंसर से होने वाली मौतों की दर भारत से 50 प्रतिशत अधिक है लेकिन पुराने श्वसन रोगों के कारण होने वाली मौते सिर्फ दसवां हिस्सा, मधुमेह के कारण होने वाली मौते सिर्फ तीसरा हिस्सा हैं और लगभग आधी मौते हृदय रोग से होती हैं। ज्यादातर अन्य औद्योगिक देशों और विकासशील देशों में अधिक सावभौमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों की वजह से यह दरें स्वीडन और भारत के बीच में कहीं हैं  

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