महामीडिया न्यूज सर्विस
भारत में असंक्रामक रोगों से निपटने की चुनौती

भारत में असंक्रामक रोगों से निपटने की चुनौती

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 277 दिन 13 घंटे पूर्व
19/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा असंक्रामक रोगों से निपटने की भारत की क्षमता तथा संक्रमणों और प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य से निपटने की उसकी क्षमता में एक और भी प्रमुख अंतर है। वित्तीय और मानव संसाधनों व सेवाओं के प्रबंधन के संदर्भ में जरूरते कहीं अधिक हैं। इसकी सबसे अहम वजह, इन समस्याओं को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के स्तर पर निपटने की समझ कम होने के बावजूद दो दशक से ज्यादा अवधि तक इन रोगों को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के सभी सरकारी प्रावधानों से जानबूझकर बाहर रखना है। प्राथमिक सेवा से जुड़ी ज्यादातर संवाद आईएमआर, एमएमआर, प्रतिरक्षण दरों और परिवार नियोजन तक सीमित रहे हैं। प्रणाली धाराणात्मक रूप से इन बीमारियों को तृतीयक देखभाल का नहीं, बल्कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के प्रमुख अंग के रूप में देखने को तैयार तक नहीं है। संक्रामक रोगों और असंक्रामक रोगों के बीच जोखिम के संदर्भ में अंतर को भी अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। गरीबी, पोषण और स्वच्छता, जिनमें हमारा प्रदर्शन विकसित देशों, यहां तक कि बहुत से विकासशील देशों से भी खराब है, में पर्याप्त सुधार न होने के बावजूद भारत ने संक्रामक रोगों के मामले में प्रगति की है लेकिन जब एनसीडी में जोखिम के प्रमुख कारकों की बात आती है, तो चाहे ज्यादा वजन और मोटापे की बात हो, या चाहे शारीरिक निष्क्रियता, अल्कोहल या धूम्रपान की बात हो- जोखिम के ये कारक विकसित देशों में कहीं ज्यादा प्रबल हैं लेकिन तब भारत में इस रोग की प्रबलता की दर इतनी अधिक क्यों है? इसका जवाब उन मार्गों की पहचान में ही नहीं, जिनके माध्यम से सामाजिक निर्धारक एनसीडी के संदर्भ में अपनी भूमिका निभाते हैं, बल्कि इन बीमारियों से निपटने वाली प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के लगभग पूरी तरह अनुपस्थित रहने में भी निहित है। निस्संदेह इसी कमी को दूर करने के लिए निजी क्षेत्र का विस्तार हुआ है लेकिन बाज़ार की ताकतें मोटे तौर पर उपचारात्मक और तृतीयक देखरेख को ज्यादा तरजीह देती हैं। बाज़ार द्वारा संचालित वृद्धि प्राथमिक और द्वितीय स्तर की रोकथाम की जरूरतों को सार्थक रूप से पूरा करने में सक्षम नहीं है और यह दायित्व सरकार को वहन करना पड़ता है। सरकार ने असंक्रामक रोगों से निपटने के लिए राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रम प्रारंभ किया है लेकिन ये सर्वव्यापी होने से कोसों दूर हैं। इसके विपरीत आरसीएच कार्यक्रम और टीबी, एचआईवी, कुष्ठ आदि जैसे के खिलाफ राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रम सर्वव्यापी हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियां प्रत्येक गर्भवती महिला का पता लगाती हैं और उसकी उपयुक्त देखभाल की गारंटी देती है, वे प्रत्येक शिशु का पता लगाती हैं और प्रतिरक्षण सुनिश्चित करती हैं, वे टीबी के प्रत्येक मामले का पता लगाती हैं और देखरेख सुनिश्चित करती हैं, आदि। असंक्रामक रोगों के मामले में, कुछ इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़कर, सेवाओं तक ऐसी सर्वव्यापी पहुंच के लिए स्पष्ट योजना का कार्यान्वयन किया जाना अभी बाकी है। एनसीडी के प्रति योजना बनाने की दिशा में एक समस्या यह है कि असंक्रामक रोगों की सूची लंबी है और ऐसे में बहुल लंबवत कार्यक्रम तैयार कर पाना आसान नहीं है, जिस तरह प्रमुख संक्रामक रोगों से निपटा जाता है। यहां तक कि संक्रामक रोगों के लिए भी तेजी से ऐसा महसूस किया जाने लगा है कि इन लंबवत कार्यक्रमों के स्थान पर क्षैतिज एकीकरण किया जाना चाहिए। असंक्रामक रोगों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए क्षैतिज एकीकरण अनिवार्य है। प्रत्येक एनसीडी अथवा यहां तक कि समस्त एनसीडी के लिए पृथक चिकित्सकों और सहायता कर्मियों की अपेक्षा करना काफी अव्यवहारिक होगा। स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ बनाने का प्रमुख माध्यम राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन था, जिसका अब राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के साथ विलय कर दिया गया है और उसका नाम राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन रख दिया गया है। स्वास्थ्य हालांकि राज्य का विषय है लेकिन यह स्पष्ट है कि राज्यों को कठिनाइयों से निपटने और अपनी स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ बनाने के लिए वित्तीय एवं वैचारिक दोनों प्रकार से केंद्रीय सहायता जरूरत है। राज्यों के संघीय स्वरूप का सम्मान करने के लिए उनके लिए वार्षिक योजना कार्यान्यवन योजनाएं बनाने की जरूरत है, जिन्हें केंद्र-राज्य समन्वयन समिति के अंतर्गत मंजूरी दी जाए। यद्यपि समय के साथ नियम ज्यादा से ज्यादा कड़े होते गए हैं लेकिन राज्यों ने अपनी योजनाएं बनाने में काफी लचीलापन अपनाया है। ज्यादातर राज्यों ने जिन नवाचारों को चुना है, उनमें से एक है 900,000 सामुदायिक स्वास्थ्य स्वयंसेवियों आशा का कार्यबल तैयार करना। इन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय तक पहुंचाने और उनका उपयोग बढ़ाने की दिशा में तथा स्वास्थ्य शिक्षा के क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान दिया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन का एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान 178,000 स्वास्थ्य कर्मियों को सार्वजनिक प्रणाली से जोड़ना है, जिसमें 90 के दशक में लंबे अर्से की उपेक्षाओं की वजह से कार्यबल की कमी संकट के कगार तक पहुंच गई थी। एनएचएम के तहत निशुल्क आपात सेवा और मरीजों को परिवहन सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए 18000 से ज्यादा एम्बुलेंसों की व्यवस्था की गई। सभी राज्यों में, बहिरंग रोगियों, बिस्तरों के उपयोग और अस्पतालों में प्रसव कराने के मामलों में काफी वृद्धि हुई है। हालांकि इन गतिविधियों में असमानताएं रहीं और सेवाओं में 80 प्रतिशत से ज्यादा वृद्धि में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के 20 प्रतिशत से भी कम में योगदान दिया और वे मोटे तौर पर आरसीएच सेवाओं तक ही सीमित रहीं। वर्ष 2012 से वित्तपोषण में वृद्धि, जरूरतों के साथ तालमेल नहीं रख पाई और यही वह समय था जब जरूरतमंद राज्य धन को समाहित कर पाने की संस्थागत क्षमता विकसित कर रहे थे। वित्तपोषण में वृद्धि के अभाव का कारण धन के उपयोग में अकुशलता, खराब प्रशासन और लीकेज रहा, जिनकी वजह से कुछ नीतिगत हलकों में एनएचएम की बदनामी हुई। इसमें कोई संदेह नहीं कि एनएचएम को इन समस्याओं का सामना करना पड़ा लेकिन ये समस्याएं नई नहीं हैं और ये प्रशासन के अभाव का प्रतिबिंब हैं, जिसकी वजह से अन्य पद्धतियां भी परेशानी से घिरती रही हैं। एक अन्य स्पष्टीकरण सार्वजनिक प्रणालियों में निवेश करने के प्रति बेरुखी हो सकता है, क्योंकि नीति में निजी क्षेत्र की त्वरित वृद्धि को प्रोत्साहन देने पर ध्यान केंद्रित किया गया, जो अब निजी स्वास्थ्य सेवा उद्योग के रूप में सामने आ रहा है। अंत में कह सकते हैं कि एनएचएम का वित्तपोषण उसकी विफलता से बंद नहीं हुआ बल्कि सफल होने के खतरे के कारण वह सहायता से वंचित हो गया। यह अतिशियोक्ति हो सकती है लेकिन उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का प्रारूप स्वास्थ्य सेवा उद्योग की वृद्धि के लिए अनुकूल स्थितियां तैयार करने के लिए सरकारी प्रयासों का सराहनापूर्वक ब्यौरा देता है।

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