महामीडिया न्यूज सर्विस
भारत में स्वास्थ्य सेवा उद्योग का उदय

भारत में स्वास्थ्य सेवा उद्योग का उदय

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 277 दिन 12 घंटे पूर्व
19/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा वर्ष 2013 में राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन को मंजूरी दी गई थी लेकिन इसके बाद भी केंद की ओर से वित्तीय सहायता में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के मसौदे में कहा गया है, समग्र सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ बनाने के वास्ते जितना निवेश और मानव संसाधन उपलब्ध कराए गए, उनसे कहीं ज्यादा की जरूरत है। बजट की प्राप्ति हुई और एनआरएचएम की संरचना में पूरी तरह नई जान डालने के लिए जितने बजट की परिकल्पना की गई थी उसका मात्र करीब 40 प्रतिशत ही व्यय किया गया। राजनीतिक इच्छा शक्ति के अलावा तीन अन्य कारक हैं, जो स्वास्थ्य प्रणालियों को सुदृढ़ बनाने के लिए जरूरी निवेश की राह में प्रमुख चुनौती या बाधा हैं। इनमें से पहला हैः केंद्र से राज्य की अधिकार संपन्न स्वास्थ्य संस्थाओं को सीधे धन हस्तांतरित होने के स्थान पर, वह राजकोष और राज्य बजटीय व्यवस्थाओं के माध्यम से मिलने लगा है। इस प्रकार की व्यवस्था का समर्थन करने के पीछे अच्छे राजनीतिक कारण हो सकते हैं लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनीतिक विशुद्धता प्रशासनिक व्यवहारिकता के अनुरूप होनी चाहिए, अन्यथा हम इस धन का इस्तेमाल कर पाने में नाकाम रहेंगे। दूसरी समस्या हैः सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का वित्त पोषण सख्त विविध श्रेणी वाले मदों की आपूर्ति के पक्ष में बजटिंग पर आधारित होता है, जो लेन-देन की लागत और अक्षमताओं से भरपूर होता है। मांग के अनुरूप संसाधनों के आवंटन से वित्त के प्रवाह और उसके उपयोग में काफी सुधार हो सकता है, जैसे -मिसाल के तौर पर थाईलैंड में हुआ। हालांकि इसकी पेशकश स्वास्थ्य नीति के मसौदे में की गई है किंतु इसे लागू किया जाना बाकी है। तीसरी और सबसे बड़ी रुकावटः सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में नियमित और विश्वसनीय रोजगार के संदर्भ में कुशल स्वास्थ्य कर्मियों की तादाद बढ़ाने की दिशा में निवेश करने के प्रति अनिच्छा है। सभी स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों में कुछ सार्वजनिक स्वास्थ्य लागत का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा, उससे भी ज्यादा सेवा प्रदाताओं के भुगतान पर खर्च होता है, जब अल्प विकसित देशों में यह प्राथमिक देखभाल से संबंधित है। सभी देश संपूर्ण स्वास्थ्य सेवा की दिशा में सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहे हैं, इस बात पर ध्यान दिए बगैर कि उनकी योजनाओं में एक समान विशेषता हैः पर्याप्त संख्या में कुशल और वेतनभोगी स्वास्थ्य कर्मी अग्रिम कतार में हैं। यदि प्रणालियां निजी क्षेत्र से सेवा क्रय पर आधारित होंगी, तो इस बात की संभावना है कि वेतन पर कम नहीं, कहीं ज्यादा खर्च करेंगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2015 के मसौदे में आगे कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवा की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश का न होना, स्वास्थ्य सेवा की लागत की वजह से, सेवाओं के दाम और निर्धनता के संदर्भ में बदहाल होती स्थिति के रूप में बहुत अच्छे से परिलक्षित हुआ है। रोगों के बोझ का रुख असंक्रामक रोगों की ओर मुड़ गया है और चूंकि ये रोग बेहद भीड़भाड़ वाले सरकारी मेडिकल काॅलेज अस्पतालों के अलावा, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के दायरे में नहीं आते ऐसे में लोगों को निजी स्वास्थ्य सेवाओं का रुख करना पड़ा है। यह बदलाव शहरी क्षेत्रों में और पुरानी बीमारियों के मामले में ज्यादा स्पष्ट है। इस परिवर्तन का तत्काल प्रभाव स्वास्थ्य सेवाओं की कीमत में बेतहाशा वृद्धि के रूप में सामने आया है और अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन करने वाले केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों भी इससे अछूते नहीं रहे हैं। यह परिवर्तन उद्योग की तरह स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में भी निजी क्षेत्र की त्वरित वृद्धि का कारण और परिणाम है जबकि निजी स्वास्थ्य सेवा, मोटे तौर पर किसी डाॅक्टर के दवाखाने या छोटे नर्सिंग होम्स तक सीमित होती थी, जहां मालिक ही निवेशक और प्रबंधक होते थे और जहां शीर्ष प्रबंधन के वेतन और मुनाफे में बहुत कम अंतर होता था वहीं यह नए प्रकार की निजी स्वास्थ्य सेवा है, जो निवेशकों से मिले धन पर आधारित है, जिनकी मुख्य चिंता निवेश पर मोटा मुनाफा कमाना होता है। यह निजी स्वास्थ्य सेवा उद्योग लगभग 15 प्रतिशत सीएजीआर पर वृद्धि कर रही है, सेवा क्षेत्र के वृद्धि दर से दोगुना और समग्र राष्ट्रीय वृद्धि दर से तीन गुना अधिक है। इसने व्यापक उद्यम पूंजी भी आकृष्ट की है। इसके बिल्कुल पीछे निजी स्वास्थ्य बीमा उद्योग भी है, जिसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमाएं घटाए जाने के बाद और ज्यादा तेज गति से वृद्धि होने की संभावना है। निजी स्वास्थ्य सेवा उद्योग का मूल्य 40 बिलियन डाॅलर है और बाज़ार के स्रोतों के मुताबिक इसके 2020 तक 280 बिलियन तक बढ़ने का अनुमान है। इसमें से लगभग 50 प्रतिशत अस्पताल सेवाओं को जाता है, जिसके लिए मरीज भुगतान करतेे हैं। शेष औषधीय, चिकित्सकीय उपकरण और बीमा खंडों को जाता है। निजी स्वास्थ्य सेवा उद्योग की वृद्धि सुनिश्चित करती है कि जनसंख्या के शीर्ष 100 की स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच है, जो तुलनात्मक रूप से वैश्विक तौर पर बेहतरीन है। स्वास्थ्य सेवा उद्योग का खंड, इस 10 प्रतिशत की जरूरतें पूरी करता है और साथ ही विदेशी ग्राहकों/मरीजों को भी आकृष्ट करता है। हालांकि यह विशेषज्ञों को स्वास्थ्य क्षेत्र के इस खंड में नौकरी करने के लिए आकृष्ट करता है, जिसका आशय है कि जिन्हें विशेषज्ञ के परामर्श की आवश्यकता है, वे भले ही आय या धन की दृष्टि से शीर्ष दस प्रतिशत में न आते हों, उन्हें इन काॅर्पोरेट अस्पतालों में ही जाना होगा। यह निजी स्वास्थ्य सेवा उद्योग के लिए अनर्थकारी स्वास्थ्य खर्च का भार भी बढ़ाता है, वैश्विक मापदंडों के अनुसार एक अथवा दो दशक को सम्मिलित करने वाला बाज़ार बहुत विशाल, ज्यादातर यूरोपीय देशों से बड़ा बाज़ार है लेकिन इसकी वजह से आंतरिक स्तर पर विशेषज्ञों का प्रतिभा पलायन होता है और तो और यदि यह क्षेत्र उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के शीर्षतम वेतन के समान वेतन दे, तो भी उन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के प्रति आकृष्ट करना या बनाए रख पाना तेजी से मुश्किल होता जा रहा है। इस बात का खतरा है कि इनमें से ज्यादातर अस्पताल जिस व्यापारिक माॅडल पर आधारित हैं यथा- रैफर करने वाले डाॅक्टरों को प्रोत्साहन देना अथवा किसी दवा या निदान का नुस्खा लिखने वाले या निदान का ज्यादा उपयोग करने वाले डाॅक्टरों को प्रोत्साहन देना ये सभी मानक व्यवसायिक परिपाटी बन सकते हैं और इसकी वजह से अच्छी सेवा के बारे में जनता में गलत धारणा बन सकती है। इस दिशा में सरकार के मुख्य प्रयास हैं कि यह सुनिश्चित किया जाए कि कम से कम सभी राष्ट्रीय कार्यक्रमों का लक्ष्य सबको निशुल्क स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराना हो, जो सबके लिए निशुल्क हो और उसकी पहुंच सर्वव्यापी हो तथा कवरेज की अपेक्षाकृत अच्छी दर हो। इसलिए राष्ट्रीय नीति का मसौदा इंगित करता है कि भारत में सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित एचआईवी के लिए एआरटी ड्रग्स कार्यक्रम है, जो दुनिया के विशालतम कार्यक्रमों में से एक है। समस्त मच्छर जनित रोग कार्यक्रम, टीबी, कुष्ठ, त्वरित नैदानिक किट्स और तीसरी पीढ़ी के रोगाणु-रोधक सहित सभी औषधियां और निदान निशुल्क हैं।

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