महामीडिया न्यूज सर्विस
भारत में स्वास्थ्य का दक्षता उन्नयन

भारत में स्वास्थ्य का दक्षता उन्नयन

admin | पोस्ट किया गया 356 दिन 23 घंटे पूर्व
21/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा जनता के स्वास्थ्य में सुधार तथा स्वास्थ्य एवं विकास संबंधी वांछित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मिश्रित भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के सर्वश्रेष्ठ संसाधनों का लाभ उठाने की जरूरत है। साथ ही, वित्तपोषण एवं आपूर्ति की अनूठी रणनीतियों के एकीकरण की आवश्यकता भी। इसलिए उन उपायों की आवश्यकता है, जो राज्यों को अपनी प्राथमिकता के आधार पर मुक्त संसाधनों का एक अंश स्वास्थ्य एवं सामाजिक विकास पर खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करें। भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र पर कोई भी चर्चा इसके लिए धन की आवश्यकता का उल्लेख किए बगैर अधूरी रहती है। पिछले कुछ वर्षों से स्वास्थ्य पर कर्म खर्च करने के लिए सरकारों की लगातार आलोचना होती रही है। इसके अलावा जानकारी रखने वाले टिप्पणीकारों ने भी सामाजिक क्षेत्र, विशेषकर स्वास्थ्य के लिए धन का आवंटन कम करने के लिए संभवतः अनुचित ढंग से भारत सरकार की आलोचना की। यह डर जताया गया है कि स्वास्थ्य के बजट में इन कटौतियों से जन स्वास्थ्य से संबंधित परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। हम इस आलेख में दिखाना चाहते हैं कि ऐसी बातें तथ्यों के आधार पर नहीं कही जाती हैं और मुक्त संसाधनों का अधिक से अधिक हस्तांतरण राज्य सरकार को किए जाने की गलत व्याख्या करती हैं, जबकि संविधान की व्यवस्था के अनुसार जनता को स्वास्थ्य, पोषण, पेयजल और स्वच्छता की सुविधा प्रदान करना राज्यों का ही कर्तव्य है। 2015-16 में भी आवंटन 2014-15 के संशोधित अनुमान के लगभग बराबर ही रहे। किंतु केंद्र और राज्य की वित्तीय साझेदारी का अनुपात 70:30/75:25 से बदलकर 60:40 हो गया है, जिसमें केंद्र को अधिक अनुपात में रकम खर्च करनी है। कुल बजट अनुमान की व्याख्या उसी संदर्भ में होनी चाहिए, जो इन आंकड़ों में पता नही चल रही हैं इसके अतिरिक्त चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों को स्वीकार किए जाने के कारण सभी राज्यों को कुल मिलाकर 1.78 लाख कराड़े रुपये की अतिरिक्त राशि हस्तांतरित की गई है। राज्य इस अतिरिक्त रकम का एक अंश इन्हीं क्षेत्रों में केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं में अपने हिस्से के रूप में खर्च करेंगे। शेष राशि इन राज्यों के पास मुक्त संसाधनों के रूप में होगी, जिसे वे केंद्र सरकार से निर्देश प्राप्त करने के बजाय अपनी प्राथमिकता के अनुवार मनचाहे क्षेत्रों पर खर्च करेंगे। यदि मुक्त संसाधनों का 10 प्रतिशत अंश भी स्वास्थ्य एवं उसके निर्धारकों क लिए आवंटित कर दिया जाता है, जो अनुचित अपेक्षा नहीं है, तो मोटा गणित बताता है कि स्वास्थ्य संबंधी परिणामों पर प्रभाव डालने वाले क्षेत्रों में संसाधनों की कमी शायद ही होगी। इसीलिए उन उपायों की आवश्यकता है, जो राज्यों को अपनी प्राथमिकता के आधार पर मुक्त संसाधनों का एक अंश स्वास्थ्य एवं सामाजिक विकास पर खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करें। इसलिए धन का प्रवाह कम नहीं हुआ है बल्कि उसके हस्तांतरण का तरीका बदल दिया गया है ताकि स्वायत्ता बढ़े और उसके साथ ही सार्मथ्य या क्षमता भी बढ़े। व्यय के वर्तमान स्तरों से प्राप्त होने वाले स्वास्थ्य संबंधी परिणामों का विश्लेषण किए जाने का भी उतना ही महत्व है। आय के समान स्तरों एवं विकास की समान स्थितियों वाले देशों के साथ भारत की तुलना से संकेत मिलता है कि परिणाम प्राप्त करने के मामले में हमारी प्रगति इन देशों से सुस्त रही है। उदाहरण के लिए 1990 से 2012 के बीच भारत में शिशु मृत्यु दर में 50 प्रतिशत कमी आई। किंतु उसी अवधि के दौरान बांग्लादेश 67 प्रतिशत, नेपाल 66 प्रतिशत और कंबोडिया 60 प्रतिशत। जैसे देशों में और तीव्र कमी आई। सकल घरेलू उत्पाद के प्रतिशत के रूप में स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च की बात की जाए तो बांग्लादेश तथा भारत अभी अपने जीडीपी का करीब 1.3 प्रतिशत हिस्सा खर्च करते हैं। किंतु बांग्लादेश में परिणाम प्राप्त करने की दर बहुत अधिक है, जिसके अनुसार पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर 1990 (144) से 2013 (41) के बीच 5.4 प्रतिशत की वार्षिक दर से घटी है, जबकि उसकी तुलना में भारत में 1990 (126) से 2013 (53) के बीच यह दर केवल 3.8 प्रतिषत की दर से कम हुई है।  इसलिए, खर्च के समान स्तरों के बाद भी भारत में परिणाम प्राप्त होने की गति धीमी है, जिससे पता चलता है कि केवल धनराशि बढ़ा देने से वांछित स्वास्थ्य परिणामों की प्राप्ति सुनिश्चित नहीं होती। सरकारी खर्च में भी आवंटन संबंधी सक्षमता को बढ़ाया जा सकता है ताकि बर्बादी कम हो एवं प्राथमिक तथा बचाव संबंधी सेवाओं पर अधिक ध्यान दिया जा सके, जो बीमारियों का बोझ कम करने के लिए आवश्यक है तथा जनता को स्वस्थ रखने के मामले में निवेश पर सबसे अधिक प्रतिफल प्रदान करती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों की स्वायत्ता बढ़ाने के उपाय भी विकसित किए जाने चाहिए ताकि वे अपनी आवश्यकता के अनुसार धन जुटा सकें और उसका प्रबंधन भी स्वयं ही कर सकें। इसके अतिरिक्त धन को स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों के भुगतान संबंधी परिणाम से जोड़ने के तरीके भी तलाशे जा सकते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों में काम करने वाले कर्मचारियों में प्रेरणा का स्तर कम होता है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय से मिले नवीनतम आंकड़ें बताते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र में सेवाएं होने के बाद भी असंतोषप्रद गुणवत्ता 45 प्रतिशत, लंबी प्रतीक्षा अवधि 27 प्रतिशत एवं प्रतिष्ठान दूर स्थित होने 9 प्रतिशत के कारण स्वास्थ्य सेवा के मामले में निजी सेवा प्रदाताओं को ही प्राथमिकता दी जाती है। सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के लिए लाइन आइटम बजट भुगतान पद्धति के कारण इस व्यवस्था में चुस्ती कम होती है। जवाबदेही बढ़ाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के प्रबंधकों एवं स्वास्थ्य कर्मियों के लिए प्रतिक्रियापूर्ण भुगतान प्रणाली जैसे प्रोत्साहन का भुगतान अथवा प्रदर्शन से जुड़ा प्रोत्साहन आरंभ किया जा सकता है और प्रदर्शन के सूचकों अथवा सेवाओं के बेहतर प्रसार अथवा स्वास्थ्य संबंधी मापनीय परिणामों की प्राप्ति के आधर पर उनका मूल्यांकन किया जा सकता है। सेवा प्रदाताओं के लिए प्रति व्यक्ति भुगतान प्रणालियां सेवा की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहन का काम करती हैं। उदाहरण के लिए घाना ने अपनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत 22 प्रतिशत सेवाएं प्रति व्यक्ति भुगतान प्रणाली के अंतर्गत लाने का फैसला किया और स्वास्थ्य संबंधी गंभीर मामलों, जिनके लिए रेफरल की आवश्यकता होती है, की प्रतिपूर्ति ही डीआरजी प्रणाली के अंतर्गत की जाती है। सेवाओं के अधिक अथवा कम प्रावधान की निगरानी गुणवत्ता नियंत्रण तथा आॅडिट की मजबूत नियामकीय व्यवस्था के जरिये की जाती है, जिनमें विश्वसनीय सूचना प्रणाली शामिल होती हैं इस प्रकार घाना ने सुविधा में कमी किए बगैर लागत पर नियंत्रण के लिए प्रति व्यक्ति भुगतान प्रणाली का प्रयोग कर लिया। तीसरी बात यह है कि भारत अपने जीडीपी का कुल 4 प्रतिशत स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जो अच्छी खासी राशि है। किंतु रकम को टुकड़ों में बांटे जाने और पुराने तरीके, जिसके तहत स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करते वक्त अपनी जेब से रकम खर्च करनी होती है, चिंता के प्रमुख कारक हैं। चिकित्सा के समय जेब से होने वाले खर्च की बड़ी राशि, जो स्वास्थ्य पर होने वाले निजी खर्च की करीब 86 प्रतिशत होती है, के कारण प्रति वर्ष 3.7 करोड़ लोग गरीबी के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। इस विशाल धनराशि को चिकित्सा पर खर्च के अधिक प्रगतिशील एवं प्रभावी तरीके में बदलने के लिए आवश्यक है कि इसका इस्तेमाल चिकित्सा पूर्ण भुगतान में किया जाए और धन की पूलिंग सही तरीके से की जाए।


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