महामीडिया न्यूज सर्विस
स्वास्थ्य क्षेत्र की उपादेयता

स्वास्थ्य क्षेत्र की उपादेयता

admin | पोस्ट किया गया 179 दिन 12 घंटे पूर्व
21/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा स्वास्थ्य में हितधारक के रूप में और स्वास्थ्य संबंधी परिणामों के लिए जवाबदेह के रूप में इसकी भूमिका को सरकार आम तौर पर नजरअंदाज ही करती रही है। इसी का परिणाम है कि सहयोगी के रूप में कार्य नहीं होने के कारण उपचार की ऐसी व्यवस्था पनप आई है, जिसमें निजी खर्च अधिक होता है और निजी क्षेत्र से सुविधा भी ज्यादा मिलती है। इसलिए सरकार सार्वजनिक खर्च एवं सार्वजनिक आपूर्ति वाली मजबूत प्राथमिक चिकित्सा प्रणाली तैयार करने के अपने प्रयास तेज करती रहे किंतु वह विशाल निजी क्षेत्र को नजरअंदाज नहीं करती रह सकती। समुचित नियामकीय ढांचे के साथ हाथ मिलाने एवं परस्पर लाभकारी साझेदारी करने के लिए रणीनतियां तैयार की जानी चाहिए, जांची जानी चाहिए और उनका मूल्यांकन होना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि जनता के स्वास्थ्य में सुधार के लिए तथा स्वास्थ्य एंव विकास संबंधी वांछित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मिश्रित भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के सर्वश्रेष्ठ संसाधनों का लाभ कैसे उठाया जा सकता है। वित्तपोषण एवं आपूर्ति की अनूठी रणनीतियों का एकीकरण करने वाले प्रायोगिक अध्यन प्राथमिकता के आधार पर कराए जाने चाहिए ताकि इस बात के प्रमाण मिल सकें कि प्रभावी तरीके से खर्च करने के लिए एवं उसके अनुपात में परिणाम प्राप्त करने के लिए अलग-अलग राज्यों में क्या कारगर होगा। अंत में यह वास्तविकता काफी हद तक नजरअंदाज की गई है कि भारत के वर्तमान स्वास्थ्य संबंधी परिणाम खर्च के वर्तमान स्तर के भी अनुपात में नहीं हैं। इस वास्तविकता से यह तथ्य गौण नहीं हो जाता कि स्वास्थ्य पर खर्च को धीरे-धीरे बढ़ाया जाना चाहिए बल्कि इससे प्रश्न खड़ा होता है कि स्वास्थ्य परिणामों में सुधार क्या पूरी तरह सार्वजनिक धन पर ही निर्भर हैं ओर आवंटन में ऐसी कौन सी खामियां हैं, जिन्हें उपलब्ध धन को चतुराई के साथ खर्च करने के लिए दूर करना होगा। स्वास्थ्य से संबंधित कानूनी वातावरण भी अभी भ्रमित करने वाला है, जिसमें केंद्र तथा राज्यों द्वारा स्वीकार्यता एवं क्रियान्वयन के स्तर पर ढेरों कानून मौजूद हैं। उन्हें विशेष रूप से गरीबों एवं समाज के वंचित वर्गों को निष्पक्ष तरीके से स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के समग्र लक्ष्य के अनुरूप संवारा एवं व्यवस्थित किया जाना आवश्यक हैं किफायती स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करना देश में प्रत्येक व्यक्ति का अटल अधिकार होना चाहिए। नीति के वर्तमान मसौदे में स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार का दर्जा दिलाने तथा राज्यों को इसे स्वीकार करने का विकल्प दिए जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया गया हैं नीति के इस पक्ष पर राज्य सरकारों से ही नहीं बल्कि समुदायों के नेताओं एवं कानूनी विषेषज्ञों से भी अधिक चर्चा किए जाने की आवश्यकता है। ऐसा साहसिक कदम उठाने से पूर्व केंद्र एवं राज्य सरकारों को सर्तकतापूर्वक यह आंकना और समझना चाहिए कि ऐसे प्रावधान के क्रियान्वयन में क्या चुनौती आएगी। नीति में स्वास्थ्य पर सतत विकास के लक्ष्यों के एक भाग के रूप में सर्वव्यापी स्वास्थ्य सुविधा के वैश्विक सहमति वाले लक्ष्य के अनुसार ही सार्वभौतिक स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया गया है। भारत सरकार सार्वभौतिक स्वास्थ्य सुविधा को राष्ट्रीय लक्ष्य के रूप में स्वीकार करने पर सै़द्धांतिक रूप से सहमत थी किंतु धरातल पर ऐसा करने के लिए पर्याप्त संसाधन उसे अभी उपलब्ध कराने हैं। सभी को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करनी है तो निम्न एवं मध्यम आय वाले वर्गों को वित्तीय जोखिम से बचाने के लिए स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं के साथ गरीबों एवं हाशिये पर पड़े लोगों के लिए औषधियों एवं निदान सेवाओं समेत पूर्ण वित्तीय सहायता वाली स्वास्थ्य सेवाओं का मिश्रण एकदम सटीक तरीका होगा। यह बात आश्वस्त करने वाली है कि वर्तमान मसौदे में अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य कूटनीति को मिलाकर नीतिगत ढांचा तैयार करने की बात कही गई है। भारत को औषधि उत्पादन में अग्रणी देश के रूप में, अफ्रीकी एवं एशियाई देशों में जीवनरक्षक औषधियों के बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में तथा राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि तथा बेहतर स्वास्थ्य मानकों के विकास में सहायता करने वाली व्यापार एवं बौद्धिक संपदा प्रणालियां विकसित करने के प्रमुख पक्षधर के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका का पुनराकलन करना चाहिए। विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले राष्ट्र से दक्षिण में अन्य देशों को वित्तीय एवं तकनीकी सहायता के शुद्ध दाता के रूप में भारत के कायांतरण के कारण भी उस पर नए दायित्व आए हैं, जो स्वास्थ्य क्षेत्र में भी झलकने चाहिए। यदि नई स्वास्थ्य नीति में इस नई भूमिका एवं बाजार का नीति के अभिन्न अंग के रूप में आकलन किया जाए तो अच्छा होगा। भारत आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश एवं पर्यावरण संरक्षण के तीन स्तंभों पर टिके अपने ही विकास के मार्ग में परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। नई स्वास्थ्य नीति में ये उद्देश्य पूरे करने की दृष्टि होनी चाहिए और लक्ष्य निर्धारित करने एवं इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वित्तीय, तकनीकी तथा प्रशासकीय सहायता उपलब्ध कराने के मामले में व्यावहारिक भी होना चाहिए।
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