महामीडिया न्यूज सर्विस
सतत विकास के युग में मेरा स्वास्थ्य

सतत विकास के युग में मेरा स्वास्थ्य

admin | पोस्ट किया गया 178 दिन 13 घंटे पूर्व
22/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रासंगिक क्षेत्रों पर सहस्राब्दि लक्ष्य ने सिर्फ उर्धवाधर दृष्टिकोणों को अपनाया। वहीं सतत् विकास लक्ष्य, स्वास्थ्य के प्रति जीवन का संदर्भगत अध्ययन करने का दृष्टिकोण अपनाकर और स्वास्थ्य इक्विटी को बढ़ावा देने और स्वास्थ्य देखभाल की लागत के खिलाफ वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करने में स्वास्थ्य प्रणाली की भूमिका पर बल देकर, स्वास्थ्य सहस्राब्दि लक्ष्य की त्रुटियों को ठीक करता है। सतत् विकास का एकमात्र स्वास्थ्य लक्ष्य सभी के लिए स्वस्थ जीवन और हर उम्र में आरोग्य है। क्या किसी देश के आर्थिक विकास से स्वास्थ्य क्षेत्र को निश्चित ही लाभ मिलने की अपेक्षा की जा सकती है? क्या लोगों का स्वास्थ्य आर्थिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण निवेश है? स्वास्थ्य किस प्रकार विकास के अन्य क्षेत्रों से संबंधित है, जो अक्सर असंबद्ध प्रतीत होते हैं और यहां तक कि संसाधनों के लिए प्रतिस्पर्धा भी करते हैं? वैश्विक विकास के एजेंडे में शामिल वे स्वास्थ्य प्राथमिकताएं क्या हैं, जो भारत के लिए प्रासंगिक हैं? हालांकि इन सवालों पर कई दशकों से चर्चा की गई है लेकिन अधिक स्पष्टता हाल के वर्षों में सामने आई है। सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों और सतत विकास में लक्ष्यों में स्वास्थ्य की प्रमुखता, जिसे उसके उपरांत संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा स्वीकार किया गया, इस मान्यता से उत्पन्न होती है कि स्वास्थ्य न्यायोचित और टिकाऊ विकास के लिए निर्णायक है और विकास के अन्य क्षेत्रों से परस्पर बारीकी से जुड़ा है। जनसंख्या के स्वास्थ्य की स्थिति देश के आर्थिक विकास के साथ सुधरती है। जैसा कि अक्सर उद्धृत किया जाने वाला प्रीस्टन कर्व दर्शाता है, जैसे-जैसे किसी देश में औसत प्रति व्यक्ति आय निम्न स्तर से बढ़ती है, समय के साथ जीवन प्रत्याशा तेजी से बढ़ जाती है। यह लाभ उच्च प्रति व्यक्ति आय के साथ अपने शिखर पर पहुंच जाता है और उसके उपरांत आय में वृद्धि के साथ, जीवन प्रत्याशा में मामूली वृद्धिशील बढ़त होती है। हालांकि केट पिकेट और विल्किनसन दर्शाते हैं कि प्रति व्यक्ति आय के समान स्तर पर, जिन देशों में जनसंख्या के भीतर आय में अंतर का निम्न स्तर होता है, उनमें जनसंख्या के भीतर उच्च आय अंतरों वाले देशों की तुलना में जीवन प्रत्याशा और अन्य स्वास्थ्य संकेतक बेहतर होते हैं। उनकी पुस्तक द स्प्रिट लेवल में उनहोंने इस आशय के साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं कि किस प्रकार, कम समानता वाले देशों में अमीर भी अधिक समानता वाले देशों में अपने समकक्षों की तुलना में पिछड़ जाते हैं। यद्यपि 20वीं सदी के एक बड़े कालखंड में पारंपरिक आर्थिक ज्ञान अच्छे स्वास्थ्य और बेहतर पोषण को आर्थिक वृद्धि के निष्क्रिय लाभों के रूप में देखता रहा, लेकिन इस सदी के बाद के दौर में जनसंख्या के स्वास्थ्य और पोषण को त्वरित आर्थिक विकास को बलपूर्वक ऊपर ले जाने वाले उपकरण के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। 1993 के अपने नाॅबले पुरस्कार व्याख्या में, अर्थशास्त्री राॅबर्ट फोगल ने समझाया था कि कैसे 1790-1980 के दौरान ब्रिटेन की आर्थिक वृद्धि का 50 प्रतिशत बेहतर पोषण के कारण माना जा सकता है, जो 1790-1930 के दौरान अपनाई गई सामाजिक नीतियों में परिलक्षित होता है। स्वास्थ्य में निवेश शीर्षक वाली 1993 की विश्व विकास रिपोर्ट में अधिक से अधिक आर्थिक निवेश करने की सशक्त वकालत की गई है। 1990 के दशक के अंत में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने समष्टि अर्थशास्त्र और स्वास्थ्य पर एक आयोग का गठन किया, जिसने आर्थिक विकास के लिए स्वास्थ के महत्वपूर्ण योगदान पर साक्ष्य प्रस्तुत किए। स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के बीच द्वि-आयामी संबंध अब दृढ़ता से स्थापित हैं। बाद में द लेंसेट कमीशन आॅन इन्वेस्टिंग इन हेल्थ ने अनुमान प्रस्तुत किया कि कम और मध्यम आय वाले देश स्वास्थ्य में आर्थिक निवेश करने पर 9 से 20 गुना रिटर्न हासिल कर सकते हैं। गरीबी और स्वास्थ्य और शिक्षा और स्वास्थ्य के बीच संबंध, समग्र आय और स्वास्थ्य के बीच संबंधों से भी ज्यादा तीव्र हैं। मातृ एवं शिशु मृत्यु की उच्च दरों, अल्पोषण, संक्रामक रोगों, मानसिक बीमारी, चोटों, तंबाकू की खपत और वायु प्रदूषण के संपर्क में आने के कारण गरीब लोगों के तमाम किस्म के रोगों से पीड़ित होने की संभावना अमीरों से अधिक होती है। समाजों के आर्थिक रूप से आगे बढ़ने और सामाजिक उतार-चढ़ाव के क्रमशः उल्टे होते जाने के साथ-साथ, जब देश उच्च मध्यम और उच्च आय वर्ग की ओर बढ़ते हैं, तब यहां तक कि आमतोर पर अमीरों के साथ जुड़े हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसे रोग भी अमीरों की तुलना में गरीबों को अधिक प्रभावित करने लगते हैं। यह स्थिति अब अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया और पश्चिमी यूरोप में है, जबकि शहरी चीन और शहरी भारत भी असंक्रमण रोगों के लिए सामाजिक ढलान का उलट मार्ग दर्शाना शुरु कर चुके हैं। पीने के पानी या तंबाकू, अच्छे पोषण की सुरक्षा के अभाव, स्वास्थ्य की अपर्याप्त जानकारी और स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तक सीमित पहुंच, विशेषकर स्वास्थ्य देखभाल की बूते के बाहर की लागत जैसे बीमारी के कारकों से गरीबों का वास्ता ज्यादा पड़ता है। शिक्षा का निम्न स्तर कमजोर स्वास्थ्य की स्थिति का एक विशेष रूप से प्रमुख कारक है, जो आय से अप्रभावित है। दूसरी ओर, यदि स्वास्थ्य देखभाल की अधिकांश लागत परिवारों को क्षमता से अधिक व्यय करनी होती है, तो आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के बीच बीमारी का परिणाम अक्सर दरिद्रता या वित्तीय आघात में निकलता है। अनुमान लगाया गया है कि विश्व भर में लगभग 10 करोड़ व्यक्ति आवश्यक स्वास्यि देखभाल पर असहनीय व्यय के कारण प्रति वर्ष गरीबी में धकेल दिए जा रहे हैं। उनमें से लगभग आधे भारतीय हैं। बीमारी का परिणाम रोजगार या आय की क्षति में, अक्सर मूल्यवान संपत्ति की विपत्तिपूर्ण बिक्री में निकलता है और बच्चों की शिक्षा और पोषण पर परिवार के खर्च को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित करता है। इसी प्रकार, कोई बीमार बच्चा शिक्षा के लाभ का पूरी तरह से उपयोग करने में असमर्थ हो जाता है, जिसका परिणाम बाद में रोजगार और आय में क्षति में निकलता है। स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों में पानी, स्वच्छता, पोषण, पर्यावरण, लिंग, सामाजिक स्थिरता और सामाजिक स्थिति शामिल हैं, जो आय और शिक्षा से परे जाते हैं। कृषि और खाद्य प्रणाली की नीतियों और इनके साथ-साथ शहरी डिजाइन और परिवहन की नीतियां भी स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करती हैं। यही स्थिति ऊर्जा सुरक्षा की कमी की है, विशेष रूप से भारत में जहां कई महिलाएं और बच्चे घर के अंदर लकड़ी और गोबर जैसे ठोस जैव ईधन के जलने से वायु प्रदूषण से बुरी तरह प्रभावित होते हैं। इन संबंधों में से कई की रूपरेखा डब्ल्यूएचओ कमीशन आॅन सोशल डिटर्मिनेट्स आॅफ हेल्थ द्वार प्रस्तुत की गई है, जिसने सिफारिश की है कि स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों पर सृदृढ़ कार्यवाही के माध्यम से स्वास्थ्य की समानता में खाई को एक ही पीढ़ी के भीतर समाप्त किया जाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य के लिए अनुकूल परिस्थितियां सभी समाजों में निर्मित की जा सकें। यदि सामाजिक अभाव ने पहले से ही स्वास्थ्य की स्थिति में एक बड़ी खाई पैदा कर दी है, और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वास्तविक और तैयार उपयोग को सीमित कर दिया है, तो केवल स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग करने के लिए समान अवसर प्रदान करना पर्याप्त नहीं है। जैसा कि ब्रिटिश अर्थशास्त्री टाॅवनी ने अपनी अत्यंत प्रभावशाली पुस्तक इक्वालिटी में 80 से भी अधिक वर्ष पहले कहा था, जो समाज सामाजिक न्याय का वादा करता है, वहां लोगों को मात्र एक खुली सड़क की नहीं, बल्कि एक समान शुरुआत की भी आवश्यकता है। इन सभी विचारों का परिणाम पहले एमडीजी और बाद में एमडीजी के गठन में निकला। हालांकि वैश्विक विकास के लक्ष्यों के इन दो सेट्स को मूर्तरूप् देने वाली दृष्टि और मूल्यों में काफी भेद हैं एमडीजी मुख्यतः संयुक्त राष्ट्र की सहायता करने वाले टेक्नोक्रेट द्वारा विकसित किए गए और 2000 में उन्हें नई सहस्राब्दी के जश्न में सभी देशों द्वारा बिना आपत्ति अपना लिया गया। ये मुख्य रूप से विकसित देशों के विचारों से निर्देशित किए गए थे,जिन्होंने कम और मध्यम आय वाले देशों में गरीबी और गरीबी से संबंधित बीमारियों और भूख को कम करने का संकल्प लिया था। जो लक्ष्य निर्धारित किए गए थे, वे कम और मध्यम आय वाले देषों पर भी लागू होते थे। उसमें विकास की कोई एकीकृत दृष्टि और कई सामाजिक निर्धारकों पर बहु-क्षेत्रीय कार्रवाई करने की कोई प्रतिबद्धता नहीं थी। आठ सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्यों में से तीन में स्वास्थ्य को सीधे लक्ष्य बनाया गया था, हालांकि गरीबी में कमी और शिक्षा जैसे अन्य भी स्पष्ट रूप से इससे संबंधित थे। स्वास्थ्य एमडीजी विशेष रूप से मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर और एचआईवी-एड्स, टीबी और मलेरिया जैसी प्रमुख संक्रामक रोगों पर केंद्रित थे। इन्हें कम और मध्यम आय वाले देशों की प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के रूप में देखा गया था। असंक्रामक रोगों के पहले से ही काफी व्यापक और तेजी से बढ़ते जा रहे बोझ और तंबाकू जैसे एक बड़े हत्यारे को, जो 20वीं सदी में 10 करोड़ लोगों को मार चुका है, एक विकृत मूल्य निर्णय के कारण, शामिल किए जाने के योग्य नहीं माना गया। बढ़ते विपरीत सबूतों के बावजूद इस निर्णय में इन्हें गरीबों की समस्या नहीं होने के रूप में देखा। 

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