महामीडिया न्यूज सर्विस
पोषण और स्वास्थ्य

पोषण और स्वास्थ्य

admin | पोस्ट किया गया 325 दिन 13 घंटे पूर्व
23/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा जीवन चक्र के दौरान पोषण की कमी से ही कुपोषण की रोकथाम की जा सकती है। अगर बच्चियां कुपोषण का शिकार होंगी तो अस्वस्थ शरीर के साथ किशोरावस्था में कदम रखेंगी। इसका उनके समूचे स्वास्थ्य पर असर होगा, विशेष रूप से जब वह कम उम्र में गर्भधारण करेंगी। जिन गर्भवती किशोरियों का शारीरिक विकास पहले से प्रभावित है या जिनमें खून की कमी है, उन किशोरियों में प्रसव के समय और उसके बाद समस्याएं होने की आशंका अधिक पाई जाती हैं, जैसे उनका प्रसव समय से पहले हो सकता है या उनके शिुश कमजोर पैदा हो सकते हैं। बार-बार गर्भ धारण करना या कम अंतराल पर बच्चों को जन्म देना, साथ ही भारी शारीरिक श्रम, आहार उपलब्ध न होना, भेदभाव और पर्याप्त स्वास्थ्य देखभाल न मिलने के कारण अनेक महिलाओं में पोषण की कमी हो जाती है। इससे उनका स्वास्थ्य तो प्रभावित होता ही है, अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य और पोषण पर भी बुरा असर होता है। गर्भावस्था से लेकर शिुश के दूसरे जन्मदिन के बीच के 1,000 दिनों के दौरान महिलाओं को पोषण प्रदान करना विशेष महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भविष्य की आधारशिला रखता है। इस दौरान पूरा पोषण देने से बच्चे के बढ़ने, उसके सीखने और समझने की क्षमता पर गहरा और स्थाई प्रभाव पउ़ता है जो देश के स्वास्थ्य और कल्याण में भी योगदान देता है। महिला को गर्भावस्था के दौरान और बच्चे को जन्म के शुरुआती एक साल में पूरा पोषण देने से मस्तिष्क का उचित विकास होता है। स्वस्थ शारीरिक विकास होता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इस बात के वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि किसी व्यक्ति के जीवनपर्यन्त स्वास्थ्य का आधार इन्हीं 1,000 दिनों में निर्धारित होता है जिसमें उस व्यक्ति का मोटापा या कई गंभीर रोगों से ग्रस्त होना भी शामिल है। कुपोषण को कम करने की प्रतिबद्धता और अपनी सतत आर्थिक वृद्धि के बावजूद भारत सभी प्रमुख पोषण संकेतकों में पीछे है। रैपिड सर्वे आॅफ चिल्ड्रन के अनुसार, पांच वर्ष से कम आयु के 38.7 प्रतिशत बच्चों का विकास अवरुद्ध है, 19.8 प्रतिशत बच्चे अत्यंत जीर्ण हैं और 42.5 प्रतिशत का वजन बहुत कम है। स्टंटिग यानी शारीरिक विकास अवरुद्ध होने की वजह अल्प पोषण है, जीर्ण होना अत्यंत अल्प पोषण का सकेत है और इन्हीं दोनों के कारण बच्चों का वनज बहुत कम है। वर्ष 2006 तक इन आंकड़ों में गिरावट की दर धीमी थी। हालांकि, एनएफएचएस-3 के बाद से इसमें प्रगति हुई। वर्ष 1992-2006 में 1.2 प्रतिशत की तुलना में, वर्ष 2006-14 से हर वर्ष स्टंटिंग की औसत वार्षिक दर में 2.3 प्रतिशत की गिरावट आई। देश में कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए कई तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। इस दिशा में सरकारी विभाग और मंत्रालय ऐसी अनेक योजनाओं और कार्यक्रमों का संचालन कर रहे हैं जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पोषण की स्थिति को प्रभावित कर रहे हैं। विशेष रूप से महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का प्रमुख कार्यक्रम आईसीडीएस आंगनबाड़ी केंद्रों के कार्यकर्ताओं के माध्यम से बच्चों और गर्भवती माताओं के पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार की दिशा में कार्य करता हैं इसके अंतर्गत अनेक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, जैसे अनुपूरक पोषण, टीकाकरण स्वास्थ्य जांच, रेफरल सेवाएं आदि। इसी प्रकार खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय लोगों को सस्ता भोजन उपलब्ध कराने के सार्वजनिक वितरण प्रणाली का संचालन करता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने घरेलू आय का स्तर बढ़ाने के उदृेश्य से मनरेगा लागू किया है जिससे लोगों के लिए भोजन पाना आसान हो। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा लागू मध्यान्ह भोजन योजना दुनिया का सबसे बड़ा स्कूली भोजन कार्यक्रम है। जनजातीय मामलों का मंत्रालय जनजातीय आबादी की भूख और पोषण जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए अनेक प्रकार की पहल करता है। इसके अतिरिक्त निजी क्षेत्र, नागरिक समाज के संगठनों और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों सहित अन्य विकास भागीदारों द्वारा भी विभिन्न प्रकार की पहल की जा रही है।
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