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स्वास्थ्य का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण

स्वास्थ्य का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण

admin | पोस्ट किया गया 153 दिन 1 घंटे पूर्व
24/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा  यद्यपि प्रतिरक्षण क्षमता विश्व भर में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी है, उदाहरण के लिए 2000-2013 के बीच खसरे की घटना में 72 प्रतिशत की कमी आई है। वैष्विक स्तर पर 2000-2013 के बीच पांच वर्ष से कम उम्र में खसरे के कारण मृत्यु की घटनाएं 74 प्रतिशत कम हो गई। तीसरा, 1990 से 2013 के बीच प्रति लाख प्रसव में मातृ मृत्यु अनुपात में 45 प्रतिशत की कमी आई। जबकि लक्ष्य इसमें दो तिहाई की कमी करना था। इस प्रकार यह आंकड़ा लक्ष्य से कम रह गया। दुर्भाग्यपूर्ण  कि 89 देशों में जहां, 1990 में उच्चतम मातृ मृत्यु अनुपात था, 13 ने अपर्याप्त या कुछ भी प्रगति नहीं की है, इस क्षेत्र में औसत वार्षिक कमी दर 2 प्रतिशत से कम है। मातृ मृत्यु के बड़े मामलों में रक्तस्त्राव गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप संबंधी बीमारियां और रोगाणुता हैं इस प्रकार हमने यह लक्ष्य भी अभी तक नहीं पाया है। चौथा, 1920-2012 के दौरान प्रजनन स्वास्थ्य को सार्वभौमिक तौर पर पाने क लिए महिलाओं द्वारा गर्भनिरोधक का उपयोग प्रतिशत से बढ़कर 64 प्रतिशत हो गया और गर्भनिरोध का उपयोग नहीं करने वालों की संख्या 15 प्रतिशत से घटकर 12 प्रतिशत रह गई। लेकिन अफ्रीकी देशों में गर्भनिरोेधक का उपयोग नहीं करने वालों की संख्या सर्वाधिक 24 प्रतिशत है। इससे आगे वैश्विक स्तर पर 83 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व देखभाल का कम से कम एक मौका मिला जबकि भारत में 64 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को चार बार प्रसव पूर्व देखभाल का मौका मिला। अफ्रीकी देशों और कम आय वाले देशों में केवल 51 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को प्रसन के दौरान प्रशिक्षित नर्स की सेवा प्राप्त हुई। अतः हम यह लक्ष्य पूरा नहीं कर पाए हैं। पांचवां, 2013 में वैष्विक स्तर पर एचआईवी/एड्स से ग्रस्त 32.6 मिलियन लोगों में से 12.9 मिलियन लोगों ने एंटी-रेट्रोवायरल थेरेपी प्राप्त किया। इस प्रकार के इलाज के कारण एचआईवी से मरने वालों की संख्या 2005 में 2.4 मिलियन के स्थान पर 2013 में 1.5 मिलियन हो गई। इस प्रकार हम 201 तक एचआईवी के मामले में बढ़ोतरी को रोक देने का लक्ष्य नहीं पा सके और न ही एचआईवी/एड्स के सार्वभौमिक उपलब्धता के लक्ष्य को पा सके हैं। छठवां, वैश्विक स्तर पर 3.20 मिलियन लोगों को मलेरिया या अन्य बड़ी बीमारियों से संक्रमित होने का खतरा होता है, जिनमें से 1.2 बिलियन लोगों को सर्वाधिक खतरा है। 2013 में वैश्विक स्तर पर मलेरिया के 198 मिलियन मामले हुए जिसके कारण 5,84,000 लोगों की जानें गईं। इनमें से 90 प्रतिशत अफ्रीकी क्षेत्र में और 78 प्रतिशत पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में हुई थी। 2000-2013 के दौरान वैश्विक स्तर पर मलेरिया मृत्यु दर में 47 प्रतिशत की कमी आई। सहारा अफ्रीका में जोखिम में रह रहे 44 प्रतिशत जनसंख्या कीटनाशक से उपचारित मच्छरदानी के नीचे सो रहे हैं, जबकि 2004 में यह संख्या केवल 2 प्रतिशत थी। कुल 64 देशों ने मलेरिया की घटनाओं में कमी लाने की एमडीजी लक्ष्य को पा लिया है। इससे आगे बढ़े तो 2000-2013 के दौरान वैश्विक स्तर पर क्षय रोग के नए मामलों के वार्षिक औसत में 1.5 प्रतिशत की कमी आई है। वैश्विक स्तर पर क्षय रोग के प्रसार दर में 41 प्रतिशत की कमी के साथ मृत्यु दर में 45 प्रतिशत की गिरावट हुई है। 2007 में उच्च वैश्विक उपचार सफलता संकेत जारी है लेकिन 2013 में लगभग 1.5 मिलियन लोग वैश्विक स्तर पर क्षय रोग के कारण मृत्यु के शिकार हो गए। इस प्रकार 2015 तक वैश्विक स्तर पर मलेरिया और क्षय रोग की वृद्धि पर रोग लगाने का एमडीजी लक्ष्य पा लिया गया हैं सातवां, 2001 तक लगातार सुरक्षित पेय जल से वंचित जनसंख्या के अनुपात को आधा करने का एमडीजी लक्ष्य 2010 में ही पूरा कर लिया गया लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर केवल 116 देश ही लक्ष्य को पा सके हैं और 4 देश इस दिशा में प्रयासरत हैं। 2012 में, 748 मिलियन लोग अभी इससे वंचित थे और विभिन्न क्षेत्रों के बीच, शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों के बीच और विभिन्न आर्थिक-सामाजिक वर्गों के बीच इसमें असमानता है। वहीं दूसरी ओर बुनियादी स्वच्छता से वंचित जनसंख्या के अनुपात को आधा करने के एमडीजी लक्ष्य को नहीं पाया जा सका है। हमनें विकासशील देशों में वहनीय जरूरी दवाईयों को उपलब्ध कराने के एमडीजी लक्ष्य को नही पाया है, क्योंकि 21 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में चुनिंदा जरूरी दवाईयां केवल  प्रतिशत सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधा केंद्रों पर उपलब्ध थी। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में आम मरीज अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ मूल्यों से दो से तीन गुणा ज्यादा चुका रहे हैं। आधा करने के एमडीजी लक्ष्यों को नहीं पाया जा सका है। लगभग एक बिलियन लोग के पास कोई शौचालय नहीं है, अतः वे खुले में शौच के लिए जाते हैं। भारत में लगभग  प्रतिशत जनसंख्या खुले में शौच के लिए जाती है। इससे उच्च स्तर का पर्यावरणीय प्रदूषण होता है और वे सूक्ष्म जीवाणु संक्रमण, काॅलरा, ट्राकोमा, हेपेटाइटिस और स्टिोसोमियासिस के संपर्क में आ जाते हैं। वैश्विक स्तर पर ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली 90 प्रतिषत जनसंख्या खुले में शौच के लिए जाती है। आठवां, हमने विकासशील देशों में वहनीय जरूरी दवाईयों को उपलब्ध कराने के एमडीजी लक्ष्य को नहीं पाया है, क्योंकि 21 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में चुनिंदा जरूरी दवाईयां केवल 5 प्रतिशत सार्वजनिक क्षेत्र की सुविधा केंद्रों पर उपलब्ध थी। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में आम मरीज अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ मूल्यों से दो से तीन गुणा ज्यादा चुका रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में कई चिकित्सक, ज्यादातर निजी विभिन्न दवा कंपनियों के चिकित्सा प्रतिनिधियों के साथ अवैध रूप से मिले होते हैं और इसलिए महंगी और गैर-जरूरी अतिरिक्त दवाईयां और पैथोलाॅजिकल जांच लिखते हैं, अक्सर लापरवाही में भी लिखते हैं, अतः इस संबंध में उपभोक्ता कचहरी में ढेरों मामले दर्ज हैं। उपरोक्त को ध्यान में रखते हुए, हम जाहिर तौर पर यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सभी विकासशील देशों को सबका स्वास्थ्य को लिखित और भावनात्मक रूप से प्रथम प्राथमिकता देनी चाहिए क्येांकि यह न केवल मानव संसाधन विकास को सुनिश्चित करता है बल्कि बिना किसी जाति, वर्ग, लिंग, धर्म या क्षेत्रीय आधार पर किसी प्रकार के रोक लगाए बिना हमारी भावी पीढ़ी की बेहतरी भी सुनिश्चित करता है, जिनके हित से किसी भी प्रकार से समझौता नहीं किया जा सकता है। इसलिए विकासशील देशों को स्वास्थ्य पर अपने बजट में वृद्धि करनी होगी। भारत में हम स्वास्थ्य पर जीडीपी का केवल लगभग एक प्रतिशत खर्च करते हैं, हमारा सार्वजनिक खर्च केवल 30 प्रतिशत है, जबकि जापान इस पर 82 प्रतिशत खर्च करता है, ओईसीडी 73 प्रतिशत, कनाडा 70 प्रतिशत खर्च करता है। नतीजतन जन्म के समय जीवन प्रत्याशा जापान में आईसीडी में, कनाडा, स्विट्जरलैंड, यूएस और थाईलैंड है जो कि भारत में से काफी अधिक है। दूसरी तरफ शिशु मृत्यु दर भारत में है जो जापान से 20 गुणा, ओईसीडी और कनाडा से 10 गुणा, स्विटजरलैंड से 11 गुणा, यूएस से 7.5 गुणा और थाईलैंड से 4.5 गुणा है। केरल ने वर्षों से सामाजिक क्षेत्र को वरीयता देने के कारण स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों में ही कई विकसित देशों का स्तर प्राप्त किया हैं भारत के अन्य हिस्से इसे क्यों नहीं प्राप्त कर सकते हैं? 

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