महामीडिया न्यूज सर्विस
शिक्षा का सारोकार

शिक्षा का सारोकार

admin | पोस्ट किया गया 292 दिन 22 घंटे पूर्व
31/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा स्वतंत्र भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने 1948 में एक शिक्षा सम्मेलन में कहा था, बुनियादी शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है, क्योंकि उसके बगैर यह बतौर नागरिक जिम्मेदारियां बखूबी नहीं निभा सकता। लेकिन, अब 2005 में भी हम कहां हैं? विश्वभर में जितने अशिक्षित लोग हैं, लगभग उसके आधे भारत में हैं। भारत का रिकार्ड इतना खराब क्यों है? इस विषय के शोधकर्ताओं के अनुसार कम और घटिया स्तर की शिक्षा पाने वालों में ज्यादातर दलित, आदिवासी और धार्मिक अल्पसंख्यक होते हैं, और इनमें भी लड़कियां सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। अगर वे विद्यालय जाती भी हैं तो ज्यादा दिन वहां नहीं टिकतीं। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की स्कूल जाने की संख्या भी कोई बहुत ज्यादा उत्साहवर्धक नहीं है। और जो विद्यार्थी 12 वर्ष की स्कूली शिक्षा पूरी भी कर लेते हैं, उन्हें भी सही अर्थों में शिक्षा नहीं मिलती। अधिकांश सरकारी स्कूलों में सुविधाएं बड़ी दयनीय स्थिति में हैं। न तो उचित शाला भवन हैं, न ही पूरे शिक्षक। शिक्षा संबंधी सामग्री की स्थिति भी ठीक नहीं है। राष्ट्रीय शिक्षा नियोजन एवं प्रशासन संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार, 2003-04 में अधिकांश शालाओं में लड़कियों के लिये शौचालय तक नहीं थे। बिहार और छत्तीसगढ़ में कुल तीन से पांच प्रतिशत शालाओं में ही यह सुविधा थी। मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, गुजरात, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश की 12 से 16 प्रतिशत प्राथमिक शालाओं में ही लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था थी। पेयजल, ब्लैकबोर्ड, कक्षाआं संबंधी आंकड़े आशा नहीं जगाते। क्या दो प्रतिशत का शिक्षा प्रभार सरकारी स्कूलों में लड़कियों के शौचालय, पानी का नल, ब्लैक बोर्ड आदि की व्यवस्था करने के लिए काफी होगा? हमें यह सवाल पूछना होगा।  राजनीतिक नेतृत्व द्वारा बुनियादी शिक्षा को उच्च प्राथमिकता दिए जाने के बावजूद, केंद्र और राज्य सरकारों ने कुछ खास हासिल नहीं किया लगता है। स्कूलों में भर्ती बच्चों की संख्या में भले ही बढ़ोतरी हुई हो, लेकिन ज्यादातर बच्चे बीच में पढ़ाई छोड़कर चले जाते हैं। वे प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते। शिक्षा को आनंदमयी अभ्यास बनाने के लिए इसे स्कूली कमरों और पुस्तकों से बाहर निकालना होगा। पाठ्य पुस्तकें आवश्यक हैं, लेकिन सीखने की प्रक्रिया की न तो शुरुआत और न ही समाप्ति ही पुस्तकों से होनी चाहिए। जहां तक उच्च शिक्षा की बात है, भारत में 18 से 23 वर्ष की आयु के युवाओं में से केवल 6-7 प्रतिशत ही उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं, जबकि सिंगापुर में यह प्रतिशत 34 है और अमरीका में 50 प्रतिशत। देशभर में व्यावसायिक शिक्षा देने वाली निजी संस्थाओं की अचानक बाढ़ सी आई हुई है। इनमें से अधिकांश में न तो योग्य अध्यापक हैं, और न ही अनुसंधान की सुविधाएं। भारत में उच्च शिक्षा को संशोधित और पुनरीक्षित करने की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय प्रबंधन का भी पुनर्गठन किए जाने की आवश्यकता है। निर्णय लेने वाले प्राधिकार का विकेंद्रीकरण कर संकाय/विभाग को अधिक अधिकार दिए जाने के साथ-साथ योग्यता को प्रोत्साहन देना होगा। विश्वविद्यालय, अपना काम भली-भांति तभी कर सकते हैं जब उन्हें नये-नये विचारों के साथ प्रयोग करने की स्वतंत्रता हो और पाठ्यक्रम निर्धारण की नयी-नयी प्रविधियां अपनाने की छूट हो। इस पृष्ठभूमि में, मध्यावधि मूल्यांकन ने कृषि स्वास्थ्य और संरचना विकास के अलावा शिक्षा पर जोर दिया है। इसमें शिक्षा सहित सामाजिक क्षेत्रों के लिए आवंटन बढ़ाने की सिफारिश की गई है। राष्ट्रीय न्यूनतम साझा कार्यक्रम का दीर्घकालीन लक्ष्य शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का 6 प्रतिशत व्यय करना है। जब लोग शिक्षित होते हैं, तो हमें न केवल शिक्षक, पेशेवर लोग और उच्चाधिकारी प्राप्त होते हैं, बल्कि हमें जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक भी मिलते हैं। इससे लोग व्यक्तिगत लाभों से ऊपर उठकर सोचते हैं और सामाजिक लाभ को व्यक्तिगत हितों के ऊपर रखते हैं। योजना के इस अंक में शिक्षा के विभिन्न पहलुओं पर विद्वान लेखकों के विचार प्रस्तुत किए गए हैं। इस बीच में ही स्कूली पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों की संख्या से निपटने के लिए बंगलौर स्थित अक्षरा के सुल प्रयोग के साथ पश्चिमी उत्तरप्रदेश की मलिन बस्ती में व्यावसायिक शिक्षा के लिए नयी पहल पर भी सामग्री सम्मिलित है।
[संप्रति संयुक्तराष्ट्र राष्ट्रीय विशेष पत्रकारिता पुरुष्कार 1998 से सम्मानित मझगवाँ (कटनी) के उद्यानिकी एवं गौपालन केंद्र के मालिक, स्वतंत्र पत्रकार एवं बच्चों की आवाज के सलाहकार संपादक हैं] 

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