महामीडिया न्यूज सर्विस
शिक्षा के लिए प्रयास

शिक्षा के लिए प्रयास

admin | पोस्ट किया गया 349 दिन 8 घंटे पूर्व
31/12/2017
भोपाल (महामीडिया) राजकुमार शर्मा मैं समस्त कारपोरेट क्षेत्र से अपील करता हूं कि सरकारी संसाधनों को बढ़ाने के लिए वे शिक्षा का महत्व पर जोर देने वाले उन कुछ कारपोरेट प्रमुखों द्वारा स्थापित उदाहरण का अनुकरण करें, जिन्होंने राष्ट्र के लाभ के लिए शिक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया है। शिक्षा के समग्र राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत कारपोरेट क्षेत्र द्वारा देश के विभिन्न क्षेत्रों को गोद लिया जा सकता है। इस प्रणाली से व्यक्ति को कुछ नया करने और देने की स्वतंत्रता दी जा सकती है। शिक्षण की गुणवत्ता और मानक में भिन्नता के कारण पसंदीदा स्कूल की अवधारणा प्रबल हो रही है। स्कूलों में शिक्षण की गुणवत्ता बढ़ाने की जरूरत है। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित शिक्षा के लिए स्कूल में प्रवेश के समय से ही बच्चों को प्रतिस्पर्धी बनाया जाना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे स्कूल चलाने में गैर सरकारी संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। संपन्न अभिभावक यदि सक्षम हों तो प्रारंभिक स्कूलों में शिक्षा दिलवाने के लिए कुछ ग्रामीण बच्चों को गोद ले सकते हैं। मैं सैफई की यात्रा के दौरान इटावा के दसवीं कक्षा के कुलदीप यादव द्वारा पूछा गया एक प्रश्न बताना चाहूंगा जो इस प्रकार था: श्रीमान राष्ट्रपति जी, गांवों में भी अपार प्रतिभाएं हैं, परंतु सुविधाएं केवल शहरों व महानगरों में उपलब्ध हैं क्या आपने इन ग्रामीण बच्चों के लिए कोई योजना बनाई है ताकि उन्हें गांवों में ही अच्छी शिक्षा मिल सके? अपने ग्रामीण साथियों के लिए एक बच्चे की चिंता देखकर मुझे खुशी हुई थी। हमें इस बहुआयामी समस्या पर विचार करने की आवश्यकता है। इससे पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में बने स्कूलों में ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इन स्कूलों में पढ़ाया जा रहा पाठ्यक्रम शहरी स्कूलों जैसा नहीं है और योग्य अध्यापक भी उपलब्ध नहीं हैं। बच्चों द्वारा उठाए गए प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें इन तीनों समस्याओं का समाधान ढूंढना होगा। रोजगार के अवसर राष्ट्रव्यापी होने के कारण, पाठ्यक्रम ऐसा हो तो बदलते हुए समाज की जरूरतों पर खरा उतरे, व्यवसाय की आवश्यकताओं को पूरा करे और बच्चों को उच्च नैतिक मूल्य प्रदान करे। अच्छी शिक्षा योग्य अध्यापक ही दे सकते हैं। अध्यापक में प्रतिबद्धता होनी चाहिए, उसे शिक्षण और बच्चे के प्रति विशेष लगाव होना चाहिए। अध्यापक को प्रभावी शिक्षण देने के लिए अपेक्षित ज्ञान भी होना चाहिए। अध्यापक को स्वाभिमानी होना चाहिए और उसमें बच्चों का आदर्ष बनने के गुण होने चाहिए। निष्पादन के आधार पर उन्हें कुछ प्रतिस्पर्धा पुरस्कार दिए जाने चाहिए। निरंतर अद्यतन दूर-शिक्षा प्रणाली के माध्यम से वृहत्तर शिक्षक-शिक्षा कार्यक्रम द्वारा देश भर में ऐसी योग्यता लानी होगी। सरकार, शैक्षिक संस्थाएं मूल्यवर्धित सेवाएं उपलब्ध करवाने वाले कारपोरेट क्षेत्र के साथ मिलकर इस कार्य को वित्तपोषित और कार्यान्वित कर सकती हैं। यह बहुत जरूरी है कि हरेक स्कूल का विशाल भवन हो, उसमें हवादार, रोशनी से युक्त खुले कमरों के साथ-साथ पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं, पीने का स्वच्छ पानी, साफ शौचालय, खेल के मैदान और आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी के यंत्र और संरचना जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों। इस प्रकार की शैक्षिक संरचना को विस्तार देने के लिए सकल घरेलू उत्पाद का अतिरिक्त 2 से 3 प्रतिशत अलग रखना होगा। बच्चों की शिक्षा और उन्हें प्रबुद्ध नागरिक बनाने में माता-पिता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्हें अपने बच्चों, वह लड़का हो या लड़की, की आवश्यकताओं के बारे में भी जानकारी जरूरी होनी चाहिए। अध्यापकों की तरह माता-पिता को भी अपने समस्त आचार-व्यवहार से बच्चों के समक्ष उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। इससे माता-पिता के प्रति बच्चे के मन में आदर और प्रेम बढ़ेगा और वह उन्हें अपने आदर्श के रूप में देखेगा। यह बताया गया है कि 39 प्रतिशत स्कूली बच्चे 8वीं तक और 55 प्रतिषत बच्चे 8वीं तक पढ़ाई करके स्कूल छोड़ देते हैं। इस स्थिति में सुधार की आवश्यकता है, विशेषकर जबकि 86वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा 5 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा का अधिकार विधेयक को सहमति प्रदान कर दी गई है। परंतु एक अकेला विधेयक यह लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता बशर्ते शिक्षा इस प्रकार दी जाए कि वह लोगों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता और जिन्हें दी जा रही हो, उनकी समझ पर भी पूरा ध्यान दे। बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित करने के अतिरिक्त शिक्षा प्रणाली बच्चों को पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाने के काबिल भी होनी चाहिए और बच्चों को सृजन-समर्थ बनाने वाली भी होनी चाहिए। साथ ही, शिक्षा प्रणाली का उदृेश्य, चरित्र निर्माण, मानवीय मूल्य, प्रौद्योगिकी के माध्यम से ज्ञान बढ़ाना और बच्चों में विश्वास पैदा करना होना चाहिए ताकि वे भविष्य का सामना कर पाएं।  कर्नाटक में मैंने एक अन्य माॅडल कार्यान्वित होते हुए देखा, जिसमें कंप्यूटर की सहायता से तेजी से सिखाया जाता है ताकि बच्चे सृजनात्मक सजीवता के सहयोगी उपकरणों द्वारा रचनात्मक शिक्षा प्राप्त कर सकें। बीच में ही पढ़ाई छोड़ देने वालों को ढूंढ कर वापस स्कूल में लाया जाता है। शिक्षा की यह संपूर्ण स्थिति जब एक खुशिहाल शिक्षा प्रक्रिया और निर्भय मूल्यांकन वाली प्राथमिक अवस्था में पूरी तरह मजबूत हो जाती है, तब प्रतिभागी स्वेच्छा से सीखने लग जाते हैं। हाल ही में मुझे बहु से बच्चों व माता-पिता के ई-मेल मिले जिनमें उन्होंने उन प्रवेश परीक्षाओं की समस्या के बारे में लिखा है, जो स्कूल में नर्सरी की प्रवेश परीक्षा से लेकर 12वीं कक्षा तक और फिर कालेजों, विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए बच्चों को देनी पड़ती है। मैं इसे बच्चों पर एक भारी बोझ मानता हूं। साथ ही, इससे बच्चों को प्रवेश परीक्षा की तैयारी करवाने वाली ट्यूशनों और कोचिंग संस्थानों को पनपने का मौका मिलता है। विश्वविद्यालयों और व्यावसायिक कालेजों में प्रवेश के लिए हमें सरकार द्वारा नामित किसी एक संस्थान द्वारा एक समान अखिल भारतीय परीक्षा आयोजित करनी चाहिए। परीक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए कि कोचिंग पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों को उससे अतिरिक्त लाभ न मिले। प्रवेश परीक्षा छात्र का रुचि का मूल्यांकन करने वाली होनी चाहिए न कि वरीयता सूची तैयार करने वाली।  मुझे लगता है कि अभी परीक्षाओं में पारदर्शिता, परीक्षा की विश्वसनीय प्रणाली, मूल्यांकन और रिपोर्टिंग की जरूरत है। यह भी देखा गया है कि परीक्षाएं मुख्यतः छात्रों की स्मरण शक्ति की परीक्षा होती है। मुझे याद है कि 50 के दशक में एमआईटी मद्रास में अध्ययन के दौरान परीक्षाआं में पुस्तकों के इस्तेमाल की सुविधा थी। यह छात्रों के लिए एक ठिन परीक्षा होती थी। मैं सुझाव दूंगा कि परीक्षा प्राधिकारी परीक्षा में किताब का प्रयोग करने की सुविधा देने पर विचार कर सकते हैं। यह अध्यापकों में प्रश्न पत्र तैयार करने की सृजनात्मक और बच्चों की सृजन क्षमता का सही मूल्यांकन करने की क्षमता बढ़ाएगी। एक सुरक्षित शिक्षा प्रणाली की भी आवश्यकता है। परीक्षा आयोजकों के पास विश्वसनीय मूल्यांकन प्रणाली और यथासमय परिणामों की घोषणा करने की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। उत्तर पुस्तिकाओं की प्रारंभिक जांच के बाद एक केंद्रीकृत विशेष दल उत्तर पुस्तिकाओं के प्रत्येक समूह में से नमूने के तौर पर कोई भी उत्तर पुस्तिका निकाल कर उसका निष्पक्ष मूल्यांकन कर सकता हैं यदि प्रारंभिक मूल्यांकन और केंद्रीकृत विशेष दल के मूल्यांकन में कोई असमानता नहीं है तो यह मान लिया जाएगा कि उस समूह की उत्तर पुस्तिकाओं में अंक ठीक दिए गए हैं। उत्तर पुस्तिका में यदि कोई असमानता मिलती है तो सत्यापन क लिए एक और नमूना लेकर उसकी जांच की जा सकती है। मूल्यांकन प्रक्रिया में परीक्षकों को प्रमाणित करने के लिए परीक्षा आयोजकों द्वारा विषेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। संक्षेप में, परीक्षा आयोजक एक उत्तम प्रक्रिया विकसित करें और फिर उस मूल्यांकन प्रणाली के लिए आईएसओ प्रमाणपत्र ले लें। हाल ही में कुंभकोणम में स्कूली बच्चों के साथ हुई दुर्घटना ने देश की सभी शिक्षा संस्थाओं को हिला कर रख दिया होगा। यह दायित्व प्रायोजक संगठनों का है कि वे सुनिश्चित करें कि उनके स्कूलों में शैक्षिक क्षेत्र और उपलब्ध भौतिक सुविधाओं के प्रमुख न्यूनतम मानकों का पालन किया जाता है। सभी स्कूलों के भवनों में आवश्यक सुरक्षा उपाय उपलब्ध होने चाहिए। इनके न होने पर, स्कूलों को मान्यता नहीं दी जानी चाहिए और किन्हीं भी परिस्थितियों में इन मानकों में कोई छूट नहीं दी जानी चाहिए। हर स्तर पर ईमानदारी से इसका कार्यान्वयन बहुत जरूरी है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के कुछ क्षेत्रों में अप्रचलित हो रहे ज्ञान के साथ-साथ समय और स्थान की कठिनाइयों के कारण दूरस्थ प्रणाली से विभिन्न संस्थाओं के भिन्न-भिन्न पाठ्यक्रमों के लिए भारी मांग आई है। एक व्यावहारिक डिजीटल पुस्तकालय प्रणाली की आवश्यकता है जो अकेले ही लंबे समय तक ज्ञानपूर्ण समाज के लिए आवश्यक सुगम्यता उपलब्ध करवा पाए। प्रौद्योगिकीवर्धक शिक्षा एक उपाय है। इसके द्वारा सूचना और संचार प्रणाली के तीव्र विकास का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है। संचार के क्षेत्र में हो रहे विस्तार और कंप्यूटरों की कीमतें कम होने से प्रौघोगिकीवर्धक शिक्षा आर्थिक दृष्टि से व्यवहार्य हो जाएगी। भविष्य की संभावित कक्षाओं में, अलग-अलग स्थानों के छात्रों को दूर शिक्षा प्रणाली के द्वारा भौगोलिक दृष्टि सं बंटे हुए अनुदेशकों का एक दल पढ़ाएगा। शिक्षा वास्तविक अर्थों मं सत्य की खोज है। यह ज्ञान और प्रकाश की अंतहीन यात्रा है। ऐसी यात्रा मानवतावाद के विकास के लिए ऐसे नये रास्ते खोलती है जहां ईर्ष्या, घृणा, शत्रुता, संकीर्णता और वैमनस्य का कोई स्थान न हो। यह मनुष्य को संपूर्ण, श्रेष्ठ, नेक इंसान और विश्व के लिए एक उपयोगी व्यक्ति बनाती है। सही मायनों में विश्व बंधुत्व ऐसी शिक्षा के लिए ढाल बन जाता है। यथार्थपरक शिक्षा मनुष्य की गरिमा और आत्मसम्मान बढ़ाती है। यदि शिक्षा की यथार्थता को प्रत्येक व्यक्ति समझ ले और मानवीय गतिविधियों के प्रत्येक क्षेत्र में उसे अपना ले तो रहने के लिए विश्व और भी बेहतर स्थान बन जाएगा। केंद्र अथवा राज्य या दोनों का शिक्षा मिशन, उन प्रबुद्ध नागरिकों के निर्माण की बुनियाद है जो एक समृद्ध, खुशहाल और मजबूत राष्ट्र की रचना करेंगे।
[संप्रति संयुक्तराष्ट्र राष्ट्रीय विशेष पत्रकारिता पुरुष्कार 1998 से सम्मानित मझगवाँ (कटनी) के उद्यानिकी एवं गौपालन केंद्र के मालिक,स्वतंत्र पत्रकार एवं बच्चों की आवाज के सलाहकार संपादक हैं]

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