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अग्निहोत्र से मन का उपचार

अग्निहोत्र से मन का उपचार

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 122 दिन 7 घंटे पूर्व
19/04/2017
जब हमारे दादा अथवा पिता का जन्म हुआ था, उस समय के विश्व से वर्तमान विश्व का स्वरूप अत्यधिक भिन्न है । संभवतः सभी परिवर्तनों में से सर्वाधिक मुख्य परिवर्तन है पूरे विश्व में बढता प्रदूषण, जिसके परिणामस्वरूप हरितगृह गैसों (ग्रीन हाऊस गैस) के उत्सर्जन में तथा अन्य हानिकारक प्रभावों में वृद्धि हो गई है । जब भी हम प्रदूषण की बात करते हैं, तो सामान्यतः हम वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, भोजन प्रदूषण और भूमि प्रदूषण के विषय में विचार करते हैं । हमने अपने लेख प्राकृतिक आपदाएं एवं जलवायु परिवर्तन में बताया है कि मौसम के अस्वाभाविक स्वरूप का कारण, मानवजाति का प्रकृति पर प्रभाव है । तथापि यह मानव द्वारा की गई भौतिक स्तर की उपेक्षा तक ही सीमित नहीं है; अपितु उनके द्वारा वायुमंडल में उत्सर्जित मानसिक तथा आध्यात्मिक प्रदूषण भी इसका कारण है । मानसिक प्रदूषण लोगों के नकारात्मक विचार जैसे ? लालच, धोखा, घृणा, विनाश हेतु योजना बनाना इत्यादि के कारण होता है । यह मानसिक प्रदूषण वातावरण में प्रसारित होता है, इसिलए यह हमारे हमारे मन के नकारात्मक विचारों को बढानेवाला वातावरण बना देता है । इससे नकारात्मकता का चक्र चल पडता है जिसके मूल में मानवजाति में बढा रज-तम का आध्यात्मिक प्रदूषण होता है । तकनीकों के नवीनतम विकास से सामूहिक विनाश करनेवाले जैविक तथा नाभिकीय शस्त्रों और साथ में मानवजाति तथा मानसिक प्रदूषण में बढे रज-तम की चुनौती हमारी ओर मुंह बाए खडी है । जैविक तथा नाभिकीय आक्रमण का परिणाम मानवजीवन तथा विश्व की स्थिरता के लिए विध्वंसकारी होगा ।
अग्निहोत्र क्या है ?
वर्तमान में सम्पूर्ण विश्व इस प्रकार के भौतिक प्रदूषण पर शीघ्रता पूर्वक रोक लगाने हेतु उपाय ढूंढने हेतु प्रयत्नशील है । पवित्र अथर्ववेद (११:७:९) में एक सरल धार्मिक विधि का उल्लेख है । जिसका विस्तृत वर्णन यजुर्वेद संहिता और शतपथ ब्राह्मण (१२:४:१) में है । इससे प्रदूषण में कमी आएगी तथा वातावरण भी आध्यात्मिक रूप से शुद्ध होगा । जो व्यक्ति इस पवित्र अग्निहोत्र विधि करते हैं वे बताते हैं कि इससे तनाव कम होता है, शक्ति बढती है, तथा मानव को अधिक स्नेही बनाती है । इसे मद्यपान तथा मादक पदार्थों के व्यसन से मुक्त करवाने का एक अच्छा साधन माना जाता है । ऐसा माना जाता है कि अग्निहोत्र पौधों में जीवना शक्ति का पोषण करता है तथा हानिकारक विकिरण और रोगजनक जीवाणुओं को उदासीन बनाता है । जल संसाधनों की शुद्धि हेतु भी इसका उपयोग किया जा सकता है । ऐसा माना जाता है कि यह नाभिकीय विकिरण के दुष्प्रभावों को भी न्यून कर सकता है ।
 चार उद्देश्य 
१। वैयक्तिक और सामाजिक वायु मण्डल को शुद्ध करना है , 
२। रोग किटाणुओंको नष्ट करना 
३। वैयक्तिक और सामाजिक रोगों को दूर करना 
४। वृष्टि की कमी को दूर करना 
 
समिधाओ के प्रकार 
1. पीपल 
2. आम्र (आम) 
3. बिल्व ( बील)
4. वट (बड़ / बरकद)
5. उदुम्बर
6. पलाश 
7. खदिर
 
मुख्य हवि पद्धार्थ मुख्यत: है:-
1. जौ
2. धान / चावल(सम्भवत: छिलके सहित)
3. शक्कर
4. काले तिल 
5. पंच दलहन (मूंग, उड़द, मोठ, चोला, मसूर)
उपर्युक्त सात समिधाओ के अतिरिक्त अर्जुन-वृक्ष, शमी-वृक्ष(खेजड़ा), हरितकी, छीला-वृक्ष, एंव ऐसे वृक्षो की सूखी हुई टहनियो को समिधा के रूप में उपयोग किया जाता है जिनका वेद व वेदोक्त-शास्त्रो मे वर्णन है। उपर्युक्त के अतिरिक्त अग्निहोत्र को प्रजवलित रखने के लिये गाय के गोबर के उपले (गाय का सुखा हुआ गोबर तथा शमीवृक्ष(खेजड़े का पेड़) की सुखी हुई टहनियो(पतली लकड़ीयो) का उपयोग किया जाता है ये सभी साफ सुथरी व कीट पतंग क्रमी व किड़ो से रहित धूप मे पूर्णरूपेण सुखाई हुई होनी चाहिये।
 
उपचार पद्धति 
शारीरिक रोगों एवं मनोविकारों से उत्पन्न विपन्नता से छुटकारा पाने के लिये अग्निहोत्र से बढ़कर अन्य कोई उपयुक्त उपचार पद्धति है नहीं, यह सब सुनिश्चित होता जा रहा है। जिस गम्भीरता एवं मनोयोग से वर्तमान शोध प्रयत्न चल रहा है, उसे देखते हुए लगता है कि निकट भविष्य में निश्चित ही एक ऐसी सर्वाङ्गपूर्ण चिकित्सा पद्धति का विकास हो सकेगा जो प्रचलित सभी उपचार पद्धतियों को पीछे छोड़कर अपनी विशिष्टता क्षेत्र की सभी विकृतियों के निराकरण की पूरी- पूरी सम्भावना है। ऐसी दशा में यज्ञोपचार पद्धति का प्रादुर्भाव मानवी भविष्य के लिए एक अभिनव उपलब्धि होगी। अग्निहोत्र उपचार एक प्रकार की समूह चिकित्सा है, जिससे एक ही प्रकृति की विकृति वाले विभिन्न रोगी लाभान्वित हो सकते हैं। यह सुनिश्चित रूप में त्वरित लाभ पहुँचाने वाली, सबसे सुगम एवं सस्ती उपचार पद्धति है। जब वाष्पीभूत होने वाले औषध तत्वों को साँस के साथ घोल दिया जाता हैं तो रक्तवाही संस्थान के रास्ते ही नहीं, कण- कण तक पहुँचने वाले औषध तत्त्वों को सआँस के साथ घोल दिया जाता हैं तो रक्तवाही संस्थान के रास्ते ही नहीं, कण- कण तक पहुँचने वाले वायु संचार के रूप में भी वहाँ जा पहुँचता है, जहाँ उसकी आवश्यकता है।  
प्राचीन समय से आयुर्वेदिक पौधों के धुएँ का प्रयोग मनुष्य विभिन्न प्रकार की बीमारियों से निदान पाने के लिए करते आ रहे हैं। यज्ञ से उत्पन्न धुएँ को खाँसी, जुकाम, जलन, सूजन आदि बीमारियों के इलाज के लिए इस्तेमाल किया जाता है। मध्यकालीन युग में प्लेग जैसी घातक बीमारियों से मुक्ति पाने के लिए धूप, जड़ी-बूटी तथा सुगन्धित पदार्थों का धूम्रीकरण किया जाता था। 
           यह बहुविदित तथ्य है कि हाइपॉक्सिया (कॉमा) के रोगी को अथवा वेण्टीलेशन में व्यतिक्रम आने पर, साँस लेने में कठिनाई उत्पन्न होने पर नलिका द्वारा नाक से ऑक्सीजन पहुँचाई जाती है। किन्तु इस आक्सीजन को शुद्ध रूप में नहीं दिया जाता, इसमें कार्बन डायऑक्साइड की लगभग पाँच प्रतिशत मात्रा का भी एक संतुलित अंश रहता है, ताकि मस्तिष्क के केन्द्रों को उत्तेजित कर श्वसन प्रक्रिया नियमित बनायी जा सके। अग्निहोत्र में उत्पन्न वायु ऊर्जा में भी यही अनुपात गैसों के सम्मिश्रण का रहता है। विशिष्ट समिधाओं के प्रयुक्त स्तर का बना देती है। किन समिधाओं व किन वनौषधियों की कितनी मात्रा ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु प्रयुक्त की जाय, यह इस विधा के विशेषज्ञ जानते हैं एवं तदनुसार परिवर्तन करते रहते हैं। 
पौधों को पोषण 
अग्निहोत्र से पौधों को पोषण मिलता है, जिससे उनकी आयु में वृद्धि होती है। अग्निहोत्र जल के स्रोतों को भी शुद्ध करता है। यज्ञ के उपरान्त वायु में धूम्रीकरण के प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से सत्यापित करने के लिए डॉ. सी. एस. नौटियाल, निदेशक, सी.आई.आर.-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान, लखनऊ व अन्य शोधकर्ताओं  ने वायु प्रतिचयन यन्त्र का प्रयोग किया। उन्होंने यज्ञ से पूर्व वायु का नमूना लिया तथा यज्ञ के उपरान्त एक निश्चित अन्तराल में २४ घण्टे तक वायु का नमूना लिया और पाया कि यज्ञ के उपरान्त वायु में उपस्थित वायुजनित जीवाणुओं की संख्या कम थी। कुछ आँकड़ों के अनुसार, औषधीय धुएँ से ६० मिनट में ९४ प्रतिशत वायु में उपस्थित जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।  एक दिलचस्प खोज में पता चला है कि प्रकृति में धुँआ बीज अंकुरण को उत्तेजित  करता है। 
भौतिकीय पहलू 
भौतिक संसार में ऊर्जा की दो प्रणालियाँ ऊष्मा और ध्वनि हैं। यज्ञ के दौरान ये दोनों ऊर्जाएँ (यज्ञ से उत्पन्न होने वाली अग्नि और गायत्री तथा अन्य मन्त्रों द्वारा उत्पन्न ध्वनि) मिलकर हमारी वांछित शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक इच्छाओं को पूर्ण करने में सहयोग प्रदान करती है। यज्ञ की अग्नि में जो विशेष पदार्थ आहुत किये जाते हैं, उन्हें अग्नि में आहुत करने का एक वैज्ञानिक आधार है। वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण है कि मन्त्रों द्वारा उत्पन्न विद्युत-चुम्बकीय तरंगें हमारी आत्मिक इच्छाओं को लौकिक स्तर पर प्रसारित करने में मदद करती है।  

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