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संख्य -दर्शन

संख्य -दर्शन

admin | पोस्ट किया गया 184 दिन 8 घंटे पूर्व
19/04/2017
संख्य  प्रकुर्वते चैव प्रकृतिं च प्रचक्षते।
तत्त्वानि च चतुर्विंशत् तेन सांख्यारू प्रकीर्तितारू॥6, 
प्रकृति पुरुष के विवेक.ज्ञान का उपदेश देनेए प्रकृति का प्रतिपादन करने तथा तत्त्वों की संख्य चौबीस निर्धारित करने के कारण ये दार्शनिक श्संख्य श् कहे गये हैं। 
श्संख्य श् का अर्थ समझाते हुए शांति पर्व में कहा गया है. 
दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागतरू। 
कंचिदर्धममिप्रेत्य सा संख्येत्युपाधार्यताम्॥
अर्थात जहाँ किसी विशेष अर्थ को अभीष्ट मानकर उसके दोषों और गुणों का प्रमाणयुक्त विभाजन ;गणनाद्ध किया जाता हैए उसे संख्य समझना चाहिए। स्पष्ट है कि तत्त्व.विभाजन या गणना भी प्रमाणपूर्वक ही होती है। अतरू श्संख्य श् को गणनार्थक भी माना जाय तो उसमंी ज्ञानार्थक भाव ही प्रधान होता है। निष्कर्षतरू हम कह सकते हैं कि श्संख्य श् शब्द में संख्य ज्ञानार्थक और गणनार्थक दोनों ही है। अब प्रश्न उठता है कि संस्कृत वाङमय में श्संख्य श् शब्द किसी भी प्रकार के मोक्षोन्मुख ज्ञान के लिए प्रयुक्त हुआ है या कपिल प्रणीत संख्य  दर्शन के लिए प्रयुक्त हुआ हैघ् इसके उत्तर के लिए कतिपय प्रसंगों पर चर्चा अपेक्षित है। महाभारत में शान्तिपर्व के अन्तर्गत सृष्टिए उत्पत्तिए स्थितिए प्रलय और मोक्ष विषयक अधिकांश मत संख्य ज्ञान व शास्त्र के ही हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि उस काल तक ;महाभारत की रचना तकद्ध वह एक सुप्रतिष्ठितए सुव्यवस्थित और लोकप्रिय एकमात्र दर्शन के रूप में स्थापित हो चुका था। एक सुस्थापित दर्शन की ही अधिकाधिक विवेचनाएँ होती हैंए जिसके परिणामस्वरूप व्याख्या.निरूपण.भेद से उसके अलग.अलग भेद दिखाई पड़ने लगते हैं। इसीलिए महाभारत में तत्त्वगणनाए स्वरूप वर्णन आदि पर मतों की विविधता दृष्टिगोचर होती है। यदि इस विविधता के प्रति सावधानी न बरती जाय तो कोई भी व्यक्ति  यही मान लेगा कि महाकाव्य में संख्य  संज्ञा किसी दर्शन विशेष के लिए नहीं वरन मोक्ष हेतु श्ज्ञानमार्गश् मात्र के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार की भ्रान्ति से बचने के लिए संख्य दर्शन की विवेचना से पूर्व श्संख्य श् संज्ञा के अर्ध पर विचार करना अपेक्षित है।
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संख्य , सृष्टि रचना की व्याख्या एवं प्रकृति और पुरूष की पृथक.पृथक व्याख्या करता है। संख्य सर्वाधिक पौराणिक दर्शन माना जाता है। भारतीय समाज पर इसका इतना व्यापक प्रभाव हो चुका था कि महाभारत , विभिन्न पुराणों, उपनिषदोंए चरक संहिता और मनु संहिता में संख्य  के विशिष्ट उल्लेख मिलते है। इसके पारंपरिक जन्मदाता कपिल मुनि थे। संख्य शब्द की निष्पत्ति संख्य शब्द से हुई है। संख्य शब्द श्ख्याश् धातु में सम् उपसर्ग लगाकर व्युत्पन्न किया गया है जिसका अर्थ है श्सम्यक् ख्यातिश्। संसार में प्राणिमात्र दुरूख से निवृत्ति चाहता है। दुख क्यों होता है, इसे किस तरह सदा के लिए दूर किया जा सकता है. ये ही मनुष्य के लिए शाश्वत ज्वलन्त प्रश्न हैं। इन प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ना ही ज्ञान प्राप्त करना है। श्कपिल दर्शनश् में प्रकृति.पुरुष.विवेक.ख्याति ;ज्ञानद्ध श्सत्त्वपुरुषान्यथाख्यातिश् इस ज्ञान को ही कहा जाता है। यह ज्ञानवर्धक ख्याति ही श्संख्यश् में निहित श्ज्ञानश् रूप है। अतरू संख्य शब्द श्सम्यक् ज्ञानश् के अर्ध में भी गृहीत होता है। इस ज्ञान को प्रस्तुत करने या निरूपण करने वाले दर्शन को संख्य  दर्शन कहा जाता है। श्संख्य श् शब्द की निष्पत्ति गणनार्थक श्संख्यश् से भी मानी जाती है। ऐसा मानने में कोई विसंगति भी नहीं है। जब तत्त्वों की संख्य निश्चित नहीं हो पाई थी तब संख्य  ने सर्वप्रथम इस दृश्यमान भौतिक जगत की सूक्ष्म मीमांसा का प्रयास किया था जिसके फलस्वरूप उसके मूल में वर्तमान तत्त्वों की संख्य सामान्यतरू चौबीस निर्धारित की गई।  सांख्य पद का मूल ज्ञानार्थक श्संख्यश् पद है गणनार्थक नहीं। हमारे विचार में गणनार्थक और ज्ञानार्थक. दोनो रूपों में संख्य  की सार्थकता है। उद्देश्य.प्राप्ति में विविध रूप में श्गणनाश् के अर्थ में श्संख्य श् को स्वीकार किया जा सकता है। शान्तिपर्व में दोनों ही अर्थ एक साथ स्वीकार किये गये हैं।
संख्य  प्रकुर्वते चैव प्रकृतिं च प्रचक्षते।
तत्त्वानि च चतुर्विंशत् तेन सांख्यारू प्रकीर्तितारू॥6, 
प्रकृति पुरुष के विवेक.ज्ञान का उपदेश देनेए प्रकृति का प्रतिपादन करने तथा तत्त्वों की संख्य चौबीस निर्धारित करने के कारण ये दार्शनिक श्संख्य श् कहे गये हैं। 
श्संख्य श् का अर्थ समझाते हुए शांति पर्व में कहा गया है. 
दोषाणां च गुणानां च प्रमाणं प्रविभागतरू। 
कंचिदर्धममिप्रेत्य सा संख्येत्युपाधार्यताम्॥
अर्थात जहाँ किसी विशेष अर्थ को अभीष्ट मानकर उसके दोषों और गुणों का प्रमाणयुक्त विभाजन ;गणनाद्ध किया जाता हैए उसे संख्य समझना चाहिए। स्पष्ट है कि तत्त्व.विभाजन या गणना भी प्रमाणपूर्वक ही होती है। अतरू श्संख्य श् को गणनार्थक भी माना जाय तो उसमंी ज्ञानार्थक भाव ही प्रधान होता है। निष्कर्षतरू हम कह सकते हैं कि श्संख्य श् शब्द में संख्य ज्ञानार्थक और गणनार्थक दोनों ही है। अब प्रश्न उठता है कि संस्कृत वाङमय में श्संख्य श् शब्द किसी भी प्रकार के मोक्षोन्मुख ज्ञान के लिए प्रयुक्त हुआ है या कपिल प्रणीत संख्य  दर्शन के लिए प्रयुक्त हुआ हैघ् इसके उत्तर के लिए कतिपय प्रसंगों पर चर्चा अपेक्षित है। महाभारत में शान्तिपर्व के अन्तर्गत सृष्टिए उत्पत्तिए स्थितिए प्रलय और मोक्ष विषयक अधिकांश मत संख्य ज्ञान व शास्त्र के ही हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि उस काल तक ;महाभारत की रचना तकद्ध वह एक सुप्रतिष्ठितए सुव्यवस्थित और लोकप्रिय एकमात्र दर्शन के रूप में स्थापित हो चुका था। एक सुस्थापित दर्शन की ही अधिकाधिक विवेचनाएँ होती हैंए जिसके परिणामस्वरूप व्याख्या.निरूपण.भेद से उसके अलग.अलग भेद दिखाई पड़ने लगते हैं। इसीलिए महाभारत में तत्त्वगणनाए स्वरूप वर्णन आदि पर मतों की विविधता दृष्टिगोचर होती है। यदि इस विविधता के प्रति सावधानी न बरती जाय तो कोई भी व्यक्ति  यही मान लेगा कि महाकाव्य में संख्य  संज्ञा किसी दर्शन विशेष के लिए नहीं वरन मोक्ष हेतु श्ज्ञानमार्गश् मात्र के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार की भ्रान्ति से बचने के लिए संख्य दर्शन की विवेचना से पूर्व श्संख्य श् संज्ञा के अर्ध पर विचार करना अपेक्षित है।
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