महामीडिया न्यूज सर्विस
यज्ञीय पर्व है होली

यज्ञीय पर्व है होली

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 357 दिन 11 घंटे पूर्व
24/02/2018
भोपाल (महामीडिया) वसंत के अंत में जब ऋतु बदलती है, तो होली आती है। होली मूलतः एक यज्ञीय पर्व है। नई फसल के पकने पर 'नवअन्न यज्ञ' के जरिए अन्न को यज्ञीय ऊर्जा से संस्कारित कर उसे समाज को समर्पित करने का भाव रहता है, इसीलिए होली को 'वासंती नव-सस्येष्टि' यज्ञ नाम भी दिया है। मूल त्योहार फागुन की पूर्णिमा और उसके अगले दिन माना जाता है, लेकिन शुरुआत आठ दिन, पहले होलाष्टक से हो जाती है। होली से आठ दिन पहले दहन स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकड़ी, सूखी घास व होली का डंडा स्थापित किया जाता है। जिस गांव गली मोहल्ले के चौराहे पर यह स्थापना होती है, उस क्षेत्र में होलिका दहन तक कोई शुभ कार्य नहीं होता। होलाष्टक के विषय में यह माना जाता है कि जब भगवान श्री भोलेनाथ ने क्रोध में आकर कामदेव को भस्म किया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरुआत हुई थी। जिन प्रदेशों में होलाष्टक से जुड़ी मान्यताओं को नहीं माना जाता है, उन सभी प्रदेशों में होलाष्टक से होलिका दहन के मध्य अवधि में शुभ कार्य करने बंद नहीं किए जाते।
भविष्यपुराण के अनुसार, ढूंढला नामक राक्षसी ने तप किया और शिव-पार्वती से वरदान मांगा कि वह सुर-असुर नर-नाग किसी से न मारी जा सके। जिस बालक को खाना चाहे खा सके। कहा जाता है कि शिव ने वरदान देते समय यह शर्त रखी कि होली के दिन यह वरदान फलीभूत नहीं होगा। 
एक और मान्यता है कि होली के दिन महर्षि वशिष्ठ ने सब मनुष्यों के लिए अभयदान मांगा था, ताकि मनुष्य निःशंक होकर इस दिन हंस-खेल सके, परिहास-मनोविनोद कर सके। होली का त्योहार कब शुरू हुआ, इस बारे में विभिन्न मत हैं। मुख्य कथा, तो होलिका द्वारा प्रह्लाद को जलाने का प्रयत्न करने से जुड़ी है। शास्त्रानुसार, प्रहलाद के पिता हिरणयकश्यप ने प्रहलाद को होलिका की गोद में बिठाकर जलाने की कोशिश की, परंतु प्रह्लाद के बच जाने और होलिका के जल जाने की घटना चरितार्थ हुई। प्रह्लाद तपे कुंदन की तरह से निखरकर आए और भक्त के रूप में स्थापित हुए। छोटा काम करने में भी गौरव अनुभव कर, सामूहिक रूप से कूड़े-कर्कट की सफाई कर उसे जलाना, श्रमदान की प्रवृत्ति को सामूहिक क्रम में बढ़ावा देना भी इसी पर्व का शिक्षण है। होली पर्व सामूहिकता का संदेश लेकर आता और सभी को प्रेरणा देता है कि किसी भी स्थिति में असुरता जीतने न पाए। हिरण्यकश्यप एवं होलिका को जलना ही पड़ेगा।
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