महामीडिया न्यूज सर्विस
बस्तर, वो स्थान जहां देवी-देवता भी खेलते हैं होली

बस्तर, वो स्थान जहां देवी-देवता भी खेलते हैं होली

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 356 दिन 20 घंटे पूर्व
01/03/2018
बस्तर (महामीडिया) होली का त्योहार यूं तो पूरे भारत वर्ष में धूमधाम से मनाया जाता है, पर छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में पारम्परिक होली का अंदाज कुछ जुदा है. लोग यहां होली देखने दूर-दूर से आते हैं. यहां होली में होलिका दहन के दूसरे दिन पादुका पूजन व 'रंग-भंग' नामक अनोखी और निराली रस्म होती है. इसमें सैकड़ों की संख्या में लोग हिस्सा लेते हैं. मान्यता है कि होलिका दहन स्थल के राख से मंडई में मां दंतेश्वरी आमंत्रित देवी-देवताओं और पुजारी व सेवादारों के साथ होली खेलती हैं. इस मौके पर फागुन मंडई के अंतिम रस्म के रूप में विभिन्न ग्रामों से मेले में पहुंचे देवी-देवताओं को विधिवत विदाई भी दी जाती है. यहां का जनसमुदाय इस पारम्परिक आयोजन का जमकर लुत्फ उठाता है. यहां विराजमान सती सीता की प्राचीन प्रतिमा लगभग सात सौ साल पुरानी है. एक ही शिला में बनी इस प्रतिमा को राजा पुरुषोत्तम देव ने यहां स्थापित किया था. तब से यहां फागुन मंडई के दौरान होलिका दहन और देवी-देवताओं के होली खेलने की परम्परा चली आ रही है.
यहां के फागुन मंडई में आंवरामार रस्म के बाद सती सीता स्थल पर होलिका दहन की जाती है. यहां गंवरमार रस्म में वनभैंसा का पुतला तैयार किया जाता है. इसमें प्रयुक्त बांस का ढांचा तथा ताड़-फलंगा धोनी में प्रयुक्त ताड़ के पत्तों से होली सजती है. मंदिर के प्रधान पुजारी पारम्परिक वाद्ययंत्र मोहरी की गूंज के बीच होलिका दहन की रस्म पूरी करते हैं. पूरे देश में जहां होली के अवसर पर रंग-गुलाल खेलकर अपनी खुशी का इजहार किया जाता है, वहीं बस्तर में होली के अवसर पर मेले का आयोजन कर सामूहिक रूप से हास-परिहास करने की प्रथा आज भी विद्यमान है.
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