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ज्ञान एवं विज्ञान की विभिन्न विधाओं का स्रोत है श्रीमद्भागवत कथा- श्री बद्रीश जी

ज्ञान एवं विज्ञान की विभिन्न विधाओं का स्रोत है श्रीमद्भागवत कथा- श्री बद्रीश जी

admin | पोस्ट किया गया 194 दिन 4 घंटे पूर्व
12/03/2018
भोपाल (महामीडिया) श्री ब्रह्मानंद सरस्वती आश्रम, छान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में आज श्री बद्रीश जी महाराज ने कहा कि भक्ति के नौ लक्षण होते हैं, नौ रस होते हैं, शरीर में नौ द्वार होते हैं, नौ ग्रह होते हैं, नौ का अंक पूर्ण अंक है, ठीक उसी तरह नवम दिवस का अपना विशेष महत्व है। जिसकी सुंदरता, मूल्य एवं उपयोगिता को देखकर मानव की आंखें चौंक जायें वह स्वर्ण है और जिस मन में भगवत भक्ति का अविरल प्रवाह हो वह श्रीमद्भागवत कथा है। ज्ञान की विभिन्न कला एवं विज्ञान वस्तुतः श्रीमद्भागवत कथा से निकली है। साधारण शब्दों में यह कहा जा सकता है कि ज्ञान एवं विज्ञान की विभिन्न विधाओं का स्रोत श्रीमद्भागवत कथा है। राजा परीक्षित को मां के गर्भ में भी श्री भगवान ने स्वयं उपस्थित होकर प्राणों की रक्षा की थी। एक बार पुनः राजा परीक्षित जंगल में शिकार करने के लिए निकले, बहुत दूर जंगल में निकल जाने एवं विचरण के बाद उन्हें प्यास लगी। तब वह प्यास बुझाने के लिए एक महात्मा के आश्रम में गये और उन्होंने महात्मा को पुकारा किन्तु उन्होंने ध्यान नहीं दिया। उसी समय राजा परीक्षित को क्रोध आ गया तभी आश्रम में उपस्थित महात्मा के ब्राह्मण पुत्र ने राजा परीक्षित को मृत्यु का श्राप दे दिया। इस श्राप से बचने के लिए राजा परीक्षित ने सभी ऋषि, मुनि, महात्माओं को पुकारा जिन्होंने उपस्थित होकर किसी ने कहा कि यज्ञ करना चाहिए, किसी ने कहा कि अनुष्ठान करना चाहिए, लेकिन सभी एकमत नहीं हो सके। अंततः भगवान शिव को पुकारा गया तो उन्होंने सुखदेव जी महाराज के भेष में पहुंचकर कष्टों के निवारण की बात कही। अंततः पुनः राजा परीक्षित के सिर पर मंडरा रही मृत्यु का समाधान भी श्रीमद्भागवत कथा से ही हुआ।
इस भागवत कथा का आयोजन महर्षि विद्या मंदिर समूह, महर्षि विश्व विद्यापीठ्म एवं महर्षि विश्व शांति आंदोलन द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है जो कि 16 मार्च तक चलेगी। बारह दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन भावातीत ध्यान के अंतर्राष्ट्रीय विश्व गुरू महर्षि महेश योगी जी की प्रेरणा एवं उनके प्रिय शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी के सानिध्य में हो रहा है। आज सर्वप्रथम तीन वैदिक पंडितों ने महर्षि परिवार की परंपरा अनुसार गुरू पूजन से प्रारंभ किया।
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