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समस्त गोपनीय जानकारी एवं रहस्य का नाम श्रीमद्भागवत है- आचार्य बद्रीश जी महाराज

समस्त गोपनीय जानकारी एवं रहस्य का नाम श्रीमद्भागवत है- आचार्य बद्रीश जी महाराज

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 277 दिन 2 घंटे पूर्व
13/03/2018
भोपाल (महामीडिया) श्री ब्रह्मानंद सरस्वती आश्रम, छान में बारह दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा अमृत प्रवाह चल रही है। सुप्रसिद्ध आचार्य श्री बद्रीश जी महाराज के श्रीमुख से यह कथा विश्व शांति के प्रणेता महर्षि महेश योगी जी की प्रेरणा एवं उनके प्रिय शिष्य ब्रह्मचारी गिरीश जी के सानिध्य एवं उपस्थिति में किया जा रहा है। आज सर्वप्रथम महर्षि विद्या मंदिर समूह के उप निदेशक वासुदेव जी एवं दो वैदिक पंडितों ने मिलकर गुरू पूजन संपन्न किया, इसके पश्चात् कथा प्रारंभ हुई।
कथा वाचक आचर्य श्री बद्रीश जी महाराज ने कहा कि सृष्टि के दस प्रकार हैं, दस दिशायें हैं, शरीर में दस इंद्रियां विद्यमान हैं, श्रीमद्भागवत कथा के दस लक्षण हैं क्योंकि यह महापुराण है उसी प्रकार श्रीमद्भागवत कथा के दशम दिवस का महत्व है। श्रीमद्भागवत कथा के प्रथम दो अध्याय में श्रीमद्भागवत का महत्व प्रतिपादित किया गया है। भगवान के बारे में जितनी गोपनीय जानकारी एवं रहस्य हैं वे सभी श्रीमद्भागवत कथा में समाहित हैं। भगवान सदैव पूर्ण हैं उनसे चाहे जितना भी ले लिया जाए, उसमें कमी नहीं आती अर्थात् वह सदैव परिपूर्ण बने रहते हैं। भगवान का मायामय संसार है, क्या माया से बचने का कोई उपाय है इस पर श्री बद्रीश जी महाराज ने एक दृष्टांत प्रस्तुत किया। जब मछली पकड़ने मछुआरा जाल फेंकता है तो जाल वाले स्थान की सभी मछलियां फंस जाती हैं किन्तु मछुआरे के पैर के पास वाली मछलियां जाल में नहीं फंसती हैं। ठीक इसी तरह सभी मानव मोह जाल में फंस जाते हैं किन्तु जो स्वयं भगवान के चरणों के पास उनकी शरण में होता है वह मोहजाल से बच जाता है। यमुना जी का जो जल है उसके कण-कण में राधा और श्रीकृष्ण विद्यमान हैं इसीलिए केवल श्वेत और श्याम के दर्शन होते हैं अर्थात् यमुना के कण-कण में राधा और श्रीकृष्ण विद्यमान हैं।
श्री बद्रीश जी महाराज ने कहा कि एक बार नारद जी ने यमुना में डुबकी लगाई तो काफी दूर गहराई में चले गये उन्हें लगा अब उनकी जान निकल जायेगी किन्तु येनकेन प्रकारेण बचाव करते हुए तट पर पहुंच गये। जहां उन्होंने देखा एक हाथी फूलों की माला उनके गले में डालता है और बहुत सारे लोग उन्हें हाथी पर बैठाकर एक सुंदर नगर की ओर ले जाते हैं जहां उनका राज्याभिषेक करके एक सुंदर रानी से विवाह कर दिया जाता है। धीरे-धीरे राजकाज में नारद जी का मन रम जाता है। कुछ समय पश्चात् रानी की अचानक मौत हो जाती है। तब उन्हें बताया जाता है कि रानी के साथ ही उन्हें भी राज परिवार की परंपरा के अनुसार देह त्यागना होगा जिससे नारद जी बहुत घबरा जाते हैं, भगवान को याद करते हैं एवं इससे बचने का उपाय सोचते हैं। 
अंत में नारद जी ने मंत्रियों को बुलाकर कहा कि यह देह त्यागने के पूर्व एक बार स्नान करना चाहते हैं। बड़ी सुरक्षा के बीच उन्हें एक तालाब में स्नान की अनुमति दी जाती है। नारद जी मृत्यु की चिंता में गोता लगाकर बाहर निकले तो वही यमुना का तट था और स्वयं श्रीकृष्ण भगवान उनके सामने मुस्कुराते हुए खड़े थे, यह है भगवान की माया।
इस भागवत कथा का आयोजन महर्षि विद्या मंदिर समूह, महर्षि विश्व शांति आंदोलन एवं महर्षि विश्व विद्यापीठ्म द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया जा रहा है जो कि 16 मार्च तक चलेगी।
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