महामीडिया न्यूज सर्विस
गुड़ी पड़वा का पौराणिक महत्व

गुड़ी पड़वा का पौराणिक महत्व

admin | पोस्ट किया गया 632 दिन 2 घंटे पूर्व
16/03/2018
भोपाल (महामीडिया) गुड़ी पड़वा हर साल चैत्र नवरात्रि के शुरु होने के पहले दिन मनाया जाता है। गुड़ी का मतलब होता है विजय पताका और पड़वा का मतलब शुक्ल पक्ष का पहला दिन। इस दिन को बहुत ही शुभ दिन माना जाता है। इस शुभ मुहूर्त पर कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है। गुड़ी पड़वा का पर्व महाराष्ट् के अलावा आंध्र प्रदेश, गोवा और तेलंगाना में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा के दिन लोग घर के मुख्य दरवाजे पर गुड़ी यानी पताका लगाते हैं और दरवाजों को आम के पत्तों से तोरण द्वार बनाते है। यह अवसर है नवसृजन के नवउत्साह का, जगत को प्रकृति के प्रेमपाश में बांधने का। पौराणिक मान्यताओं को समझने व धार्मिक उद्देश्यों को जानने का। यही है नवसंवत्सर, भारतीय संस्कृति का देदीप्यमान उत्सव। 
भारतीय संस्कृति में गुड़ी पड़वा को चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को विक्रम संवत के नए साल के रूप में मनाया जाता है। इस तिथि से पौराणिक व ऐतिहासिक दोनों प्रकार की ही मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्र प्रतिपदा से ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इसी तरह के उल्लेख अथर्ववेद और शतपथ ब्राह्मण में भी मिलते हैं। इसी दिन चैत्र नवरात्रि भी प्रारंभ होती हैं। लोक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान राम का और फिर महाभारत काल में युधिष्ठिर का राज्यारोहण किया गया था। इतिहास बताता है कि इस दिन मालवा के नरेश विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर विक्रम संवत का प्रवर्तन किया। 
नववर्ष को भारत के प्रांतों में अलग-अलग तिथियों के अनुसार मनाया जाता है। ये सभी महत्वपूर्ण तिथियां मार्च और अप्रैल के महीनों में आती हैं। इस नववर्ष को प्रत्येक प्रांतों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। फिर भी पूरा देश चैत्र माह में ही नववर्ष मनाता है और इसे नवसंवत्सर के रूप में जाना जाता है। 
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