महामीडिया न्यूज सर्विस
कुमति निवार सुमति के संगी श्री हनुमान जी

कुमति निवार सुमति के संगी श्री हनुमान जी

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 390 दिन 3 घंटे पूर्व
27/03/2018
भोपाल (महामीडिया) हनुमान जयंती एक हिंदू पर्व है। यह चैत्र माह की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन को हनुमान जी के जन्मदिन के तौर पर मनाया जाता है। पवनपुत्र जी को भगवान शिव का 11वां रूद्र रूप माना गया है। धार्मिक ग्रथों के अनुसार ये आज भी जीवित है और धरती पर भ्रमण करते हैं। हमारे धर्मशास्त्रों में आत्मज्ञान की साधना के लिए तीन गुणों की अनिवार्यता बताई गई है- बल, बुद्धि और विद्या। यदि इनमें से किसी एक गुण की भी कमी हो, तो साधना का उद्देश्य सफल नहीं हो सकता है। सबसे पहले तो साधना के लिए बल जरूरी है। निर्बल व कायर व्यक्ति साधना का अधिकारी नहीं हो सकता है। दूसरे साधक में बुद्धि और विचार शक्ति होनी चाहिए। इसके बिना साधक पात्रता विकसित नहीं कर पाता है। तीसरा अनिवार्य गुण विद्या है। विद्यावान व्यक्ति ही आत्मज्ञान हासिल कर सकता है। महावीर हनुमान के जीवन में इन तीनों गुणों का अद्भुत समन्वय मिलता है। इन्हीं गुणों के बल पर भक्त शिरोमणि हनुमान जीवन की प्रत्येक कसौटी पर खरे उतरते हैं ।
हनुमानजी मातंग ऋषि के शिष्य थे। वैसे तो हनुमान जी ने कई लोगों से शिक्षा ली थी। सूर्यदेव व नारदजी के अलावा इन्होंने मातंग ऋषि से भी शिक्षा-दीक्षा ली थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार मातंग ऋषि के आश्रम में ही हनुमानजी का जन्म हुआ था। ऐसी मान्यता है श्रीलंका के जंगलों में मंतग ऋषि के वंशज आदिवासी से हनुमान जी प्रत्येक 41 साल बाद मिलने आते है।
हनुमान जी ने अपने प्रभु राम के साथ युद्ध भी किया था। दरअसल एक बार भगवान श्री राम के गुरु विश्वामित्र किसी कारणवश हनुमान जी पर क्रोधित हो गए और उन्होंने श्री राम को हनुमान जी को मौत की सजा देने को कहा। श्री राम अपने गुरू की आज्ञा पालन करते हुए हनुमान जी पर प्रहार करने लगे, लेकिन सजा के दौरान हनुमान जी राम नाम जपते रहे। जिससे उनके ऊपर प्रहार किए गए सारे शस्त्र विफल हो गए।
हनुमानजी पवन पुत्र है। कुंती ने भी पवनदेव के माध्यम से ही भीम को जन्म दिया था। इस तरह से भीम हनुमान जी भाई हुए।
राम भक्त हनुमान माता जगदम्बा के सेवक हैं। हनुमानजी माता के आगे-आगे चलते हैं और भैरवजी उनके पीछे-पीछे। माता के देश में जितने भी मंदिर है वहां उनके आसपास हनुमानजी और भैरवजी का मंदिर जरूर होते हैं।
हनुमान जी प्रार्थना में तुलसीदासजी ने हनुमान चालीसा, बजरंग बाण, हनुमान बहुक आदि अनेक स्तोत्र लिखे लेकिन क्या आप जानते हैं सबसे पहले हनुमानजी की स्तुति किसने की थी? दरअसल सबसे पहले विभीषण ने हनुमानजी की शरण लेकर उनकी स्तुति की थी। विभीषण को भी हनुमानजी की तरह चिरंजीवी होने का वरदान मिला है। वे भी आज सशरीर जीवित है। विभीषण ने हनुमानजी की स्तुति में एक बहुत ही अद्भुत और अचूक स्तोत्र की रचना की है।
हनुमानजी के पास कई वरदानी शक्तियां थीं लेकिन फिर भी वे बगैर वरदानी शक्तियों के भी शक्तिशाली थे। अशोकवाटिका पर उन पर ब्रह्राास्त्र का प्रयोग बेअसर था।
रामायणलंका कांड शुरू होते ही हनुमान जी ने हिमालय जाकर पत्थरों पर अपने नाखूनों से रामायण लिखनी शुरू कर दी थी। जब रामायण लिखने के बाद बाल्मीकि जी को ये बात हिमालय जाने पर पता चला तो वह हिमालय गए और वहां पर लिखी रामायण पढ़ी मिली। अपनी ठोड़ी के आकार के कारण से इनका नाम हनुमान पड़ा। संस्कृत में हनुमान का मतलब होता है बिगड़ी हुई ठोड़ी।
हनुमानजी 4 कारणों से सभी देवताओं में श्रेष्ठ हैं। पहला कारण यह है कि सभी देवताओं के पास अपनी शक्तियां हैं। हनुमानजी के पास खुद की शक्ति है। वे खुद की शक्ति से संचालित हैं। दूसरा कारण, शक्तिशाली होने के बावजूद ईश्वर के प्रति समर्पित हैं। तीसरा कारण वे अपने भक्तों की सहायता तुरंत ही करते हैं और चौथा कारण वे आज भी सशरीर हैं। हनुमान जी को सभी ब्रह्मचारी के रूप में जानते हैं लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका मकरध्वज नाम का एक बेटा भी था।
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