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सभी प्राणियों के प्रति सम्मान का भाव रखने वाले भगवान महावीर जी

सभी प्राणियों के प्रति सम्मान का भाव रखने वाले भगवान महावीर जी

admin | पोस्ट किया गया 454 दिन 13 घंटे पूर्व
28/03/2018
भोपाल (महामीडिया) जैनियों के २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म ईसा से ५९९ वर्ष पूर्व चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को ५४३ वर्ष विक्रम पूर्व वैशाली गणतंत्र के लिच्छिवी वंश के महाराज श्री सिद्धार्थ और माता त्रिशला देवी के यहाँ हुआ। इनका नाम वर्धमान रखा गया क्योंकि इनके जन्म से ही राजा सिद्धार्थ के राज्य में अभिवृद्धि होने लगी थी। वर्धमान जन्म से ही निर्भय थे अत: उन्हें महावीर कहा जाने लगा। महावीर 30 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर निग्र्रन्थ बन गए। उन्होंने 'ज्ञातृखंड' नामक उद्यान में जाकर 'नमो सिद्धाणं' कहकर स्वयं ही मुनि दीक्षा ली और प्रण किया कि आज से मैं किसी भी प्राणी को मन, वचन और कर्म से कष्ट नहीं दूंगा। उन्होंने मन में किसी के प्रति प्रतिशोध की भावना नहीं आने दी। इस तरह महावीर ने तप करते हुए परम तत्व की प्राप्ति की। वह महावीर से भगवान महावीर बन गए। अब उनके जानने के लिए कुछ भी बाकी नहीं रह गया था।
श्रमण भगवान महावीर ने एक ओर वैचारिक जगत में क्रांति पैदा की तो दूसरी ओर दार्शनिक जगत में जन-मानस को उद्बुद्ध किया। वैचारिक जगत में उनकी सबसे प्रथम घोषणा थी कि यह संसार किसी ईश्वरीय सत्ता द्वारा परिचालित नहीं है अपितु जड़-चेतन के संसर्ग से स्वत: ही चालित तथा अनादि अनन्त है। उनकी इस नई गवेषणा से क्रांति मच गई।  सामाजिक क्षेत्र में भगवान महावीर ने सबसे बड़ी क्रांति करते हुए प्रत्येक व्यक्ति को धर्म-साधना का अधिकार दिया। यह किसी जाति विशेष की बपौती नहीं है। उन्होंने नारी जाति को सम्मान दिया और राजा दधिवाहन की पुत्री चन्दन बाला को अपने श्रमणी संघ की प्रमुख बनाकर उच्च स्थान प्रदान किया। उन्होंने अनेकांतवादी दृष्टि से सभी धर्मों में व्याप्त सत्य को स्वीकार करने पर बल दिया और कदाग्रह से बचने की प्रेरणा दी। 
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