जीवन की गुणवत्ता सुधारते हैं धर्म और अध्यात्म

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 मनुष्य ही विश्व का केंद्रबिन्दु है। मनुष्य के कल्याणार्थ धर्म उदित होता है। सामान्यत: धर्म का अर्थ धारण करना होता है। जीवन के हर क्षेत्र में धर्म की आवश्यकता होती है। मनु ने 'मनुस्मृति' में धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा है कि इन्हे ही जीवन में अपनाने वाला मनुष्य धार्मिक होता है। भारत भूमि वह दिव्य भूमि है, जहां धन से अधिक धर्म, भोग से अधिक योग तथा सद्विचार और सद्व्यवहार के मूलाधार संस्कार और संस्कृति को ही महत्व दिया जाता है। भारतीय धर्म अत्यंत उदार होने के कारण धार्मिक संकीर्णता से परे इहलोक और परलोक से हमें जोड़ता है। धर्म वह साधु साधन माना जाता है, जो प्राणियों के ऐहिक अभ्युदय और पारलौकिक श्रेयस में सहायक सिद्ध होता है, यथा-'यतोऽभ्युदयनिश्रेयस सिद्धि: स धर्म:' धर्माचार्यो ने मनुष्य के लिए सद्गुणों और धर्माचरण के महत्व को उजागर करते हुए 'धर्मो रक्षति रक्षित:' अर्थात धर्माचरण करने वाले मनुष्य की रक्षा धर्म स्वयं ही करता है। आचार्य चाणक्य ने भी धर्मको ही मन के सुख का मुख्य केंद्र मानते हुए कहा है- 'सुखस्य मूलं धर्म:।'
'अध्यात्म' का शाब्दिक अर्थ है आत्मा से संबंध रखने वाला, आत्मा-परमात्मा संबंधी विचार, जबकि अध्यात्म का ता8िवक अर्थ है अपने आप में वापसी, आत्म-ज्ञान हो जाना, परमात्मा की उपलब्धता, आत्मबोध आदि। अर्थात् ईश्वर-तत्व की प्राप्ति होने पर जीव चेतन, अमल सुखरासी ही होकर रह जाता है। जीव अविनाशी सत्ता का ही अंश है। अतएव, सत्य और स्वाभाविक सत्ता को प्राप्त कर लेता है। व्यक्ति का अध्यात्म से संपर्क होते ही चित्त की चंचलता समाप्त हो जाती है। अतृप्त रहने वाली कामनाएं, वासनाएंऔर आकांक्षाएं लुप्त हो जाती है। आध्यात्मिक चेतना व्यक्ति को देवत्व प्रदान करते हुए सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करती है। आध्यात्मिक ऊर्जा अर्जित होते ही व्यक्ति का अंत:करण निर्मल होने से उसकी संकल्प-शक्ति दृढ़ हो जाती है। आज का व्यक्ति धर्माचरण करते हुए अपनी अर्जित आध्यात्मिक ऊर्जा स्वयं के साथ ही अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण का प्रेरणा-स्त्रोत हो सकता है। धर्म और अध्यात्म अन्योन्याश्रित होने के कारण भारत की सांस्कृतिक चेतना के मुख्य केंद्रबिंदु है।