आज ही के दिन अन्नपूर्णा के रूप में प्रकट हुई थीं मां पार्वती

आज ही के दिन अन्नपूर्णा के रूप में प्रकट हुई थीं मां पार्वती

भोपाल (महामीडिया)  मार्गशीर्ष माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन अन्नपूर्णा जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती ने पृथ्वी पर माता अन्नपूर्णा के रूप में जन्म लिया था। इस दिन माता अन्नपूर्णा की पूजा करने से घर में संपन्नता बनी रहती है। धन धान्य की कमी नहीं रहती। 
पूजन विधि
सुबह सूर्योदय के समय उठकर स्नान करके सूर्य को जल अर्पित करें। इसके बाद पूजा के स्थान और रसोई को अच्छी तरह साफ करें और गंगाजल का छिड़काव करें। इसके बाद हल्दी, कुमकुम, अक्षत, पुष्प आदि से रसोई के चूल्हे की पूजा करें। इसके बाद मां अन्नापूर्णा की प्रतिमा को किसी चौकी पर स्थापित करने के बाद एक सूत का धागा लेकर उसमें 17 गांठे लगा लें। उस धागे पर चंदन और कुमकुम लगाकर मां अन्नपूर्णा की तस्वीर के सामने रखकर 10 दूर्वा और 10 अक्षत अर्पित करें। इसके बाद मातारानी से परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखने की प्रार्थना करें। फिर सूत के धागे को घर के पुरुषों के दाएं हाथ महिलाओं के बाएं हाथ की कलाई पर बांधें और कथा पढ़ने के बाद प्रसाद चढ़ाएं। बाद में माता से अपनी गलतियों की क्षमा मांगें। पूजन के बाद किसी गरीब को अन्न का दान करें।
ये है कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार एक बार पृथ्वी पर अन्न की कमी हो गई और लोग भूखे मरने लगे। त्रासदी से त्रस्त होकर लोगों ने भगवान ब्रह्मा, विष्णु से प्रार्थना की। इसके बाद ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान शिव जी को योग निन्द्रा से जगाया और सम्पूर्ण समस्या से अवगत कराया। समस्या के निवारण के लिए स्वयं भगवान शिव ने पृथ्वी का निरक्षण किया। उसके बाद माता पार्वती ने अन्नपूर्णा का रूप लिया और पृथ्वी पर प्रकट हुईं। इसके बाद शिव जी ने भिक्षुक का रूप रखकर अन्नपूर्णा देवी से चावल भिक्षा में मांगे और उन्हें भूखे लोगों के बीच बांटा। इसके बाद पृथ्वी पर अन्न जल का संकट खत्म हो गया। जिस दिन माता पार्वती अन्न की देवी के रूप में प्रकट हुईं थीं, उस दिन मार्गशीर्ष पूर्णिमा का दिन था। तब से इस दिन को माता अन्नपूर्णा के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

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