गुरुदेव की कृपा का फल

गुरुदेव की कृपा का फल

भोपाल (महामीडिया) ये विश्व प्रशासन का नारा जो ये आज है, ये ज्ञानयुग के ग्यारहवें वर्ष की अनुभूति हो रही है। वो इसीलिये हो रही है कि ज्ञानवृक्ष-वेद की सत्ता ज्यादा गहराई से मानवीय चेतना में उतरी है और जैसे-जैसे ज्ञान गहराई में जाता है विश्व चेतना में वैसे-वैसे क्रियाशक्ति सारे विश्व को वैश्विक क्षेत्र में प्रभावित करके ऊपरी व्यवहार के क्षेत्र में उत्तमता लाते जाते हैं। ये अनुभूति की ज्ञान की गहराई में क्रियाशक्ति की सफलता है। ये अनुभूति की योगिक अन्तमुर्खता में सामाजिक समस्याओं का, राष्ट्रीय समस्याओं का हल है, ये दुर्लभ अनुभूति है। गुरु दिखाते हैं ये दुर्लभ तत्व को, गुरु एक तत्व में समझाते हैं, जड़ में पानी डालो फल फूल पत्ते सब हरे भरे रहेंगे। जितना ज्यादा व्यवहार में उन्नति करना चाहते हो उतना ज्यादा भीतर समाहित रहो योगस्थ: कुरु कर्माणि और जबसे योगस्थ होना छूटा, जबसे योगिक अनुभूतियाँ कठिन होने लगीं, प्रचार की गड़बड़ी से इसको अपने एक शब्द में डाल देते हैं- कलियुग का प्रभाव जो भी हुआ हो लेकिन सारे कलियुग का प्रभाव सारे विश्व में हो, किन्तु गुरुदेव की कृपा सर्वोपरि है। वह सारे कलियुग के प्रभाव को मिटा देने में समर्थ है। गुरुकृपा से प्रत्येक व्यक्ति के लिए अर्न्तमुखता इतनी सरल हो गई है, जिसके कारण व्यवहार की पूर्णता, व्यवहारिकता, सर्व समर्थता सबके लिए इतनी सरल हो गई है जिसका हिसाब नहीं। अब स्थिति ये है, गुरु कृपा से हम लहर परत-परत दिखा रहे हैं। किन-किन परतों में गुरुकृपा अपने साथ है, ये योगिक चेतना बनाना सरल हुआ। क्या सरल हुआ, सारे विश्व में समस्याओं को शांत करने का एक सुगम उपाय मिला। क्या हुआ, सामूहिक भावातीत ध्यान में सिद्धियों का अभ्यास करके यदि सामूहिक सिद्धियों की संख्या 7000 हो जाये, यहीं बैठे- बैठे राम झरोखे बैठकर सारे विश्व की चेतना को सदा पावन करते रहेंगे।
ये विश्व प्रशासन का आदर्श है, ये विश्व प्रशासन के आदर्श में क्या है? धर्म का साम्राज्य है। प्रकृति के नियमों का उपयोग है, प्रकृति के नियम ही सारे विश्व ब्रह्माण्ड की कितनी अनेकानेक संस्थाओं को इतने सुव्यवस्थित रूप से चलाते हैं। प्रकृति के नियम उसको अपनी भाषा में- भारतीय भाषा में कहते हैं- धर्म सत्ता, जो धारण करती है, वो धर्म सत्ता प्रत्येक व्यक्ति की चेतना में उतरना इतना सरल हो गया है। इसीलिए कहते हैं कि सर्व समर्थता प्राप्त हो सकती है। इसीलिए एक विद्यापीठ की स्थापना की है कि देखो वास्तव में सर्वसमर्थ व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और इसमें दो, तीन, चार साल से ज्यादा नहीं लगना चाहिये वेद विज्ञान विद्यापीठ के विद्यार्थियों के लिए, ये संकल्प सिद्धिवान व्यक्तित्व हो जायें। इन्हें 25 वर्ष रुकने की जरूरत नहीं पड़ेगी कि जब 25 वर्ष के होंगे तब संकल्प सिद्धि होगी, इसीलिए कि गुरुकृपा अपने साथ है। जो अत्यन्त दुष्कर्म दुर्गम-दुर्गम पथस्त कवियों वदन्ति ये जो परम्परा की दुर्गमता है हजारों वर्ष से दुर्गमता है अब वह सिद्धांत बदल गया है। क्षिप्रम भवति धर्मात्मा का समय आया है। ये गुरु कृपा है, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, व्यक्ति के, समाज के, कुटुम्ब के राष्ट्र के और प्रत्येक क्रियात्मक रूप से हैं और उतना ही सैद्धांतिक पूर्णता और क्रिया की पूर्णता ने सारे कलियुग के समय को एक ऐसी कर्वट दी है कि रात्रि का अन्धकार समाप्त हो रहा है, दिन का उजाला आ रहा है।
जिस रूप में वेद समझा गया था, जिस रूप में पठन-पाठन हो रहा था, जिस रूप से वैदिक वाङ्गमय को समझा गया था, जिस रूप से वैदिक वाङ्गमय के रूप का पठन-पाठन हो रहा था उसी ने मूलत: वेद की सहज सुलभ पूर्णता को तिरोहित कर दिया था। वेद की सहज सुलभ पूर्णता, ये शब्द इस समय प्रयुक्त हो सकते हैं। अभी इस वर्ष की गुरुपूर्णिमा का गुरु का पूजन करके गुरु के प्रभाव में ये देखते हैं कि वेद ज्ञान की सहज सुलभ पूर्णता। प्रत्येक शब्द का अन्त है वेद की सत्ता की सहज सुलभ पूर्णता जिसके माने शुद्ध ज्ञान पूर्णता। अनन्त क्रियाशक्ति की पूर्णता में अपनी चेतना को जगा लेना और वो दोनों सहज सुलभ, इसका कारण? गुरु कृपा से क्या मिला अपने को, जिसके कारण ये शब्द प्रयाग अपने कर सकते हैं? एक शब्द आनुपूर्वीय, एक शब्द आनुपूर्वीय में सारे वैदिक वाङ्गमय को प्रत्येक की चेतना में जगा लेने की सामर्थ्य अपने को दी है। सारी वेदानुपूर्वी 'अ' से प्रारम्भ होती है 'अ' आनन्द का वाचक-आत्मा का वाचक-आत्मा की सत्ता का प्रबोधक, तो ये सारा वेद आत्मा की सत्ता का प्रबोधक है और आत्मा सहज सुलभ नित्य है इसीलिए वेद अब इस युग में गुरु की कृपा से सहज सुलभ प्राप्त हो गया है अपनी पूर्णता में, जिसमें शुद्ध ज्ञान की सत्ता-आनन्द क्रिया शक्ति का जागरण है। गुरु तत्व इतना गुरु:तत्व है, इतना गुरु:तत्व है किन्तु हमारे अपने गुरु परम्परा में गुरू वशिष्ट ने कहा दूरेदृशं किसको देखा दूर में गृहपतिमथर्युम अपने विश्व ब्रह्माण्ड के दूरातिदूर क्षेत्र में आत्मासत्ता का ही स्पन्दन आनुपूर्वीय ढंग से वेद के रूप में फैला हुआ अनन्त की सृष्टि कर रहा वेद दूरेदृशं गृहपतिमथर्मुम किसने कहा? अपने गुरु परम्परा के एक गुरुदेव ने कहा, गुरु वशिष्ट की वाणी है ये, परम पुनीत वाणी है ये और इस वाणी की चरितार्थता गुरुदेव की कृपा से एक बिल्कुल निरक्षर ब्रह्मचारी ने सारी दुनिया को कहा देखो- देखो दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम। दूर से दूर में देखो, ये वेदांत की अहं ब्रह्मास्मि का ठाठ बनता है, इसमें अत्ता चराचरग्रहणात् होता है। चेतना सारी क्रियाशक्ति को अपने में लेके शुद्ध संहिता तत्व में प्रतिष्ठित होती है। जैसी है वैसी हो जाती है, जो नहीं है अभिव्यक्त का क्षेत्र वो समाप्त है जो है वो बना रहता है और जो है सहज सुलभ नित्य पूर्णता में सहज सुलभ है। गुरु तत्व की महिमा अपार है और उस तत्व को अपनी चेतना में जागृत करके अपने सारे विश्व को हजारों वर्षों से दु:ख, अशांति, दरिद्रता और समस्याओं से घिरे हुये अपने कुटुम्ब, अपने विश्व को सहज सुलभ रूप से इतना ऊँचे उठाते हैं इतना ऊँचे उठायेंगे, उतने ऊँचे उठा रहे हैं और उठाते रहेंगे, यहीं से वेद विज्ञान विद्यापीठ से, जितना कि कोई उठ कोई सकता है। क्या होगा, युग परिवर्तन होगा। ये युग परिर्वतन का समय है, हजारों वर्षों से सप्त वेद विद्या अब जागृत हुई है, गुरु कृपा से जागृत हुई है। संहिता तत्व स्वयं जागृत है और इस प्रकार का काल बदलना सतयुग से त्रेता, फिर द्वापर और कलयुग, ये कालचक्र का नियमन वेद की ऋचाओं से होता है, ये सारा दो चार मिनट में विद्यार्थी समझ जायेंगे, ये केवल उन्हें दो चार दिनों में पहला सूक्त पढ़ा देंगे और उसमें जो आनुपूर्वी होगी और उस आनुपूर्वी के क्रम में जो नियमबद्धता होगी, जो व्याकरण से और निरुक्त से और छन्द के सिद्धांतों से प्रकाश में आयी है, उसको दो चार दिन में समझाकर यहां से वहां तक जो आनुपूर्वी क्रम बनाया बस उन्हीं सिद्धांतों के ऊपर सारे विश्व ब्रह्माण्डों के सृजन पालन संहार की आनुपूर्वी चलती जा रही है तो थोड़े से में पूरा का पूरा जो ज्योतिष आदि इतने परम दुरूह विषय हैं, ये आयुर्वेद इतने परम दुरूह विषय हैं, ये व्याकरण सारे सृष्टि का विस्तार इतने दुरुह विषय हैं जब तक दृष्टि वैसी नहीं बनेगी कि दूरे दृशम् पतिम अथुर्यं हम अपने आप आत्मा के स्पन्दन को विश्व के दूरतम क्षेत्र में जब तक नहीं जानते हैं तब तक हमारा सिद्धांत दूरतम् क्षेत्रों में और सृष्टि के दूरतम क्षेत्रों में सम्बन्ध नहीं बनता और तब तक संहिता आनुपूर्वी क्रम की हम पंडित नहीं बनें तो एक आनुपूर्वी क्रम थोड़े दूर तक समझा देने से और ये प्रथम सूक्त की नौ ऋचाओं का आनुपूर्वी क्रम देख लेने से सारा वैदिक वांङ्गमय अपने सामने इतना स्पष्ट होता है। इसमें क्या स्पष्ट होता है? ये ऋषि तत्व प्रधान, ये देवता तत्व प्रधान, ये छन्द तत्व प्रधान सारे अपने एक आनुपूर्वी क्रम से सजे हुए हैं। वेद विज्ञान का अनावरण अपनी एक चेतना में करना अत्यन्त सरल है, अत्यन्त सरल है, अत्यन्त सरल है। अब अपने इस बात के लिये जिम्मेवार नहीं है कि अभी तक बड़ा कठिन मानते हैं, तमाम चीजें असम्भव होती हैं रात्रि के अंधेरे में, लेकिन रात्रि सदा नहीं रहती, दिन आता है और जैसे ही पौ फटती है, जैसे प्रातः की अरुणिमा आई वो रात की दिक्कतें, वो रात की समस्यायें किसी को याद भी नहीं होती। प्रकाश में ऐसा समय अब आ गया है और वो गुरुदेव की कृपा से आया है।
आया है।...(निरंतर)
 

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