चैत्र नवरात्रि को राम नवरात्रि भी कहते हैं http://www.mahamediaonline.com

चैत्र नवरात्रि को राम नवरात्रि भी कहते हैं

भोपाल [महामीडिया]   चैत्र नवरात्रि के अवसर पर देवी आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्र के नौ दिनों में भक्त भक्तिभाव से माता की उपासना करते हैं। इसलिए नौ दिनों में उपासक देवी स्थापना, उपवास और दूसरे शास्त्रोक्त उपाय कर मां की कृपा पाने के उपाय करते हैं। एक वर्ष में वैसे तो चार नवरात्र आती है, लेकिन शारदीय नवरात्र और वासंतीय नवरात्र का विशेष महत्व है। इन दोनों नवरात्र के नौ दिनों में देवी उपासक माता को प्रसन्न करने के अनेक उपाय करते हैं।नवरात्रि के नौ दिनों में माता के नौ रूपों की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्र के दौ दिनों में भक्तों को माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। चैत्र और आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तिथि तक होने वाले नवरात्र का महत्व ज्यादा होता है। इन दोनों नवरात्र में भक्त मां की उपासना करते हैं। आश्विन मास के नवरात्र को शारदीय नवरात्र और चैत्र नवरात्र को वासंती नवरात्र कहा जाता है, वासंती नाम वसंत ऋतु में आने के कारण दिया गया है। चारों नवरात्र में आश्विन नवरात्र को महानवरात्र कहा गया है। आश्विन नवरात्र का अंतिम दिवस विजयादशमी होता है, जो शक्ति का प्रतीक है, इसलिए इस नवरात्र को महानवरात्र कहा जाता है।चैत्र नवरात्र के लिये घटस्थापना चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा को होती है, जो हिन्दु कैलेण्डर का पहला दिन होता है। इसलिए चैत्र नवरात्र के पहले दिन से वर्ष का प्रारंभ भी माना जाता है। महाराष्ट्र में इस दिन को गुड़ीपड़वा, दक्षिण भारत के ज्यादातर हिस्सों में उगादी और कश्मीर में इसको नवरे के रूप में मनाते हैं।चैत्र नवरात्र के अंतिम दिन भगवान श्रीराम का जन्मदिन होता है, जबकि शारदीय नवरात्र के अंतिम दिन श्रीराम रावण का वध करते हैं। इसलिए कुछ जगहों पर चैत्र नवरात्रि को राम नवरात्र के नाम से भी जाना जाता है। आश्विन नवरात्र को महाविरत्री भी कहा जाता है। इस नवरात्र में देवी भवानी के नौ रूपों दुर्गा, भद्रकाली, जगदम्बा, अन्नपूर्णा, सर्वमंगल, भैरवी, चंदिका, ललिता, भवानी और मुकाम्बिका की पूजा का भी प्रावधान है। यह भी मान्यता है कि प्रभु श्रीराम ने रावण वध के लिए आश्विन नवरात्र में माता के नौ रूपों की आराधना की थी और दसवें दिन रावण को मारा था।चैत्र नवरात्रि में मौसम गर्म होने लगता है इसलिए ब्रह्म मुहूर्त में गायत्री साधना करने से सभी कष्टों का नाश होता है और समस्त कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है। माता गायत्री को जगत माता कहा जाता है। वैसे तो मां गायत्री की आराधना कभी भी करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। समस्त शास्त्रोक्त मंत्रों में गायत्रीमंत्र को सर्वश्रेष्ठ मंत्र माना जाता है। गायत्री मंत्र को वेदों का सार भी माना गया है। इस मंत्र के स्मरण मात्र से समस्त पापों का नाश हो जाता है। गायत्री मंत्र के जाप से बड़े से बड़े संकट टल जाते है और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। गायत्री मंत्र को सभी तरह के दुखों के नाश की संजीवनी बूटी माना जाता है।
गायत्री मंत्र के जाप से मानव को सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है, लेकिन नवरात्रि के अवसर पर की गई गायत्री साधना विशेष फलदायी और कामनाओं की पूर्ति करने वाली होती है। ऋतुओं का संधिकाल इसी समय होते हैं इसलिए वैदिक मंत्रों को सिद्ध करने के लिए इस समय को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।नवरात्रि साधना को दो भागों में विभक्त किया गया है। जिसमें एक भाग में जप-तप का प्रावधान किया गया है तो दूसरी ओर आहार-विहार और संयमित जीवन का विधान शास्त्रों में किया गया है। इन दोनों भागों को साथ में मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष उपासना संपन्न होती है।नवरात्रि में गायत्री मंत्र का निर्धारित मात्रा में जप करने से विशेष लाभ मिलता है। नवरात्रि के अवसर पर 9 दिनों में 24 हजार मंत्रों के जाप का विधान शास्त्रों में मिलता है। क्योंकि गायत्री मंत्र के 24 हजार मंत्रों के जाप को लघु गायत्री अनुष्ठान कहा गया है। रोजाना 27 माला गायत्री मंत्र का जाप करने से 9 दिनों में 240 माला पूर्ण होती है। यानी नवरात्र के नौ दिनों में जपों की संख्या 24 हजार को पार कर जाती है। इस तरह रोजाना दो से ढाई घंटे एक दिन में मंत्र जाप में लगते हैं।गायत्री मंत्र का जाप तुलसी की माला से करना सर्वश्रेष्ठ रहता है। गायत्री उपासना के लिए स्नान आदि से निवृत्त होकर पूर्व दिशा में मुंह करके कुश या ऊन का आसन बिछाकर बैठे। अपने सामने माता गायत्री का चित्र एक पाट पर पीला कपड़ा बिछाकर स्थापित करें। । गाय के घी का दीपक और धूपबत्ती जलाए। धूप, दीप, अक्षत, रोली, फल, फूल, मिठाई, सुपारी माता को समर्पित करें और माता गायत्री के मंत्र जाप का प्रारंभ करें। जप पूरा होने पर जप का शतांश हवन यानी कुल जप संख्या के सौवें हिस्से के बराबर हवन भी करना चाहिए। इसके साथ ही कन्या भोज का आयोजन करें।गायत्री मन्त्र और भावार्थ-ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तःकरण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।माता गायत्री की साधना में कुछ नियमों को विशेष ध्यान रखना चाहिए। उपासक को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। नौ दिनों तक संभव हो तो अन्न का त्यागकर फलाहार ग्रहण करना चाहिए, जैसे दूध, फल आदि। इसके अलावा यह कोशिश करना चाहिए की अपने काम स्वयं करें। कोमल शैया का त्याग करना चाहिए। हिंसा के द्वारा निर्मित किए गए गए सामानों का त्याग करे, जैसे चमड़ा, रेशम, कस्तूरी आदि।

 
 

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