धर्मः जाने ‘कलावा’ के बारे में

धर्मः जाने ‘कलावा’ के बारे में

भोपाल (महामीडिया) घर में जब भी कोई मांगलिक कार्य या पूजा का आयोजन होता है तो पंडित जी द्वारा यजमान के हाथों में रक्षा सूत्र, कलावा या मौली बांधी जाती है। वैदिक काल से कलाई में रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा चली आ रही है। इसके बारे में पुराणों में भी वर्णन मिलता है। 
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी शुभ कार्य के संकल्प के लिए कलाई में रक्षा सूत्र बांधा जाता है। जीवन में शुभता प्राप्ति के लिए भी रक्षा सूत्र बांधा जाता है। जब भी कोई नया कार्य प्रारंभ होता है या नई वस्तु खरीदी जाती है तो उस समय भी कलावा बांधा जाता है। कलाई में रक्षा सूत्र बांधने का अर्थ रक्षा से भी है। ईश्वर हमारी रक्षा करें, इसलिए भी कलावा बांधते हैं।
रक्षा सूत्र मुख्यत: पुरुष और अविवाहित कन्या की दाहिनी कलाई तथा विवाहित महिला की बाईं कलाई पर बांधा जाता है। इसे मंगलवार या शनिवार के दिन बांधना चाहिए। सामान्यत: हर व्यक्ति की कलाई में तीन रेखाएं होती हैं। इसे मणिबंध कहा जाता है। इन रेखाओं को क्रमश: शिव, विष्णु और ब्रह्मा कहते हैं। इन तीनों रेखाओं में माता शक्ति, लक्ष्मी और सरस्वती का वास माना जाता है।
जब भी रक्षा सूत्र कलाई में बांधा जाता है तो उसे तीन बार लपेटा जाता है। वह रक्षा सूत्र त्रिदेव और तीन देवियों को समर्पित होता है। मंत्र उच्चारण के साथ रक्षा सूत्र बांधने से ये सभी उस व्यक्ति की रक्षा करते हैं। नकारात्मक शक्तियों से बचाव होता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब असुरों के राजा बलि ने वामन भगवान को अपना सब कुछ दान दे दिया, तब बलि ने वामन देव से एक वरदान मांगा था। उसने भगवान विष्णु से कहा था कि पाताल लोक में वे हमेशा उसके साथ रहें। अपने वचन से बंधे भगवान विष्णु बलि के साथ रहने लगे। काफी समय बाद माता लक्ष्मी वहां आईं और बलि को रक्षासूत्र बांधकर अपना भाई बना लिया और उनसे अपने पति की रक्षा का वचन ले लिया। इस प्रकार भगवान विष्णु अपने वचन से मुक्त हुए। एक इंद्र से जुड़ी भी कथा है। इंद्र जब असुरों से युद्ध के लिए जा रहे थे तब उनकी पत्नी शची ने उनको रक्षा सूत्र बांधा था। इंद्र उस युद्ध में विजयी रहे। उसके बाद से रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा शुरु हो गई। 
 

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