वैदिक भारत के महापुरुष महर्षि महेश योगी जी

वैदिक भारत के महापुरुष महर्षि महेश योगी जी

भोपाल (महामीडिया) ब्रह्मलीन पूज्य महर्षि महेश योगी जी ने भारतीय शाश्वत् पारम्परिक वैदिक विज्ञान का अखण्ड दीप प्रज्जवलित कर इसकी प्रकाशमय ज्योति से सारे विश्व को पूर्ण ज्ञान का प्रसाद दिया।
महर्षि जी वैदिक भारत के स्वर्णिम इतिहास में एक ऐतिहासिक द्वितीय उदाहरण छोड़ गये। जब हम अपने गुरु के लिए ब्रह्मा, विष्णु, शिव और परब्रह्मा की उपाधियुक्त स्तुति करते हैं तो किंचित त्रिदेवों का भाव तो जागृत होता है किन्तु उन भक्ति के क्षणों में देवों के गुणों अथवा उनके कार्यों की व्याख्या नहीं हो पाती। महर्षि जी ने कभी भी न स्वयं को गुरु कहा और न किसी से अपने को गुरु कहलवाया। सारा जीवन अपेन परमाराध्य गुरुदेव अनन्त श्री विभूषित स्वामी ब्रह्मानन्द सरस्वती जी के श्रीचरणों का स्मरण, उनका पूजन और सारे विश्व में जय गुरुदेव का उद्घोष कर उनकी जय जयकार करते रहे और करवाते रहे।
भारतीय शाश्वत् सनातन वैदिक ज्ञान-विज्ञान के आधार पर वेदभूमि-पूर्णभूमि-देवभूमि-पुण्यभूमि-सिद्धभूमि-प्रतिभारत भारतवर्ष का जगद्गुरुत्व और ख्याति जिस तरह महर्षि जी ने समस्त भूमण्डल में हजारों वर्षों के अन्तराल के पश्चात् पुनः स्थापित की और भारतीय वैदिक ज्ञान-विज्ञान, योग, भावातीत ध्यान का लोहा मनवाया, ऐसा उदाहरण या दुष्यांत समूचे वैदिक वांगमय में या आधुनिक काल में कहीं भी वर्णित नहीं है।
1953 में श्री गुरुदेव ब्रह्मानन्द सरस्वती जी महाराज, तत्कालीन शंकराचार्य, ज्येातिर्मठ, बद्रिकाश्रम हिमालय के ब्रह्मलीन हो जाने के बाद महर्षि जी ने ऋषियों महार्षियों की तपस्थली उत्तरकाशी में साधना की और फिर सारे विश्व को ज्ञानी बनाने, धर्म अर्थ काम और मोक्ष का मार्ग दिखाने, दुःख, दरिद्र, अशांति आदि ज्वलंत समस्याओं का निदान लिये महर्षि जी ने अपनी स्वयं का साधना का आनन्द त्यागकर विश्वकल्याणार्थ निकल पड़े।
पचास वर्षों में विश्व भर में अनगिनत भ्रमण करते हुए, ज्ञान, ध्यान, योग, यज्ञादि के अनेकानेक कार्यक्रमों की रचना करके करोड़ों व्यक्तियों की जीवन धारा को एक नया मोड़ देकर विश्व की सामूहिक चेतना को जिस प्रकार थामा और उसमें सतोगुण का संचार कर रजोगुणी और तमोगुणी प्रवृत्तियों पर विजय पाई, कलिकाल के प्रभाव में रहते हुए सतयुग के उदय का उद्घोष किया, यह सब किसी भी एक सामान्य ज्ञानी या प्रशासनिक पुरुष के द्वारा होना सम्भव नहीं था। यह केवल किसी देवी शक्ति या महर्षि जी के रूप में अवतरण था जिसके लिये हजारों वर्ष का कार्य केवल 50 वर्षों में कर पाना सम्भव हो सका।
महर्षि जी ने वेद, योग और ध्यान के प्रति जन सामान्य में बिखरी भ्रान्तियों का समाधान कर उनको दूर किया। वैदिक वांगमय के 40 क्षेत्रों- ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य, वेदान्त, कर्म मीमांसा, योग, गंधर्ववेद, धनुर्वेद, स्थापत्य वेद, काश्यप् संहिता, भेल संहिता, हारीत संहिता, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, वाग्भट्ट संहिता, भावप्रकाश संहिता शार्ड्गधर संहिता, माधव निदान संहिता, उपनिषद, आरण्यक, ब्राह्मण, स्मृति, पुराण, इतिहास, ऋक् वेद प्रातिशाख्य, शुक्ल यजुर्वेद प्रातिशाख्य अथर्व वेद प्रातिशाख्य, सामवेद प्रातिशाख्य (पुष्प सूत्रम्), कृष्ण यजुर्वेद प्रातिशाख्य (तैत्तिरीय), अथर्व वेद प्रातिशाख्य (चतुरध्यायी) को एकत्र किया, उन्हें सुगठित कर व्यवस्थित स्वरूप दिया और वेद के अपौरुषेय होने की विस्तृत व्याख्या की।
महर्षि जी ने भावातीत ध्यान की सहज शैली प्रदान की, जो हर व्यक्ति अपने ही आवास में, परिवार में रहकर अभ्यास करके अपने लौकिक और परलौकिक जीवन को धन्य कर सकता है। महर्षि जी ने प्रमाणित कर दिया कि साधना के लिये हिमालय जाकर किसी गुफा में धूनी रमाकर कठिन तपस्या आवश्यक नहीं है। 230 स्वतंत्र शोध संस्थानों और विश्वविद्यालयों ने 35 देशों में 700 से अधिक वैज्ञानिक अनुसंधान करके महर्षि जी के भावातीत ध्यान और सिद्धि कार्यक्रम से मानव जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले लाभ की पुष्टि की।
महर्षि जी ने हजारों भावातीत ध्यान के केन्द्र स्थापित किये, लाखों व्यक्तियों को ध्यान और पतंज्जलि योग सूत्रों पर आधारित सिद्धि कार्यक्रम का प्रशिक्षण दिया। निष्काम कर्मयोग और ‘‘योगस्थः कुरु कर्माणि’’ का प्रयोग प्रथम बार किसी ने सम्पूर्ण विश्व को प्रायोगिक रूप में दिया। इसी क्रम में महर्षि ने भगवद् गीता की व्याख्या भी लिखी जो अपने आप में एक अनूठी कृति है। लगभग इसी समय में महर्षि जी ने ब्रह्म सूत्रों की भी व्याख्या की और ‘‘साइन्स ऑफ बीइंग एण्ड आर्ट ऑफ लिविंग’’ नामक पुस्तक लिखी, जिनका अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हो चुका है और अब तक लाखों प्रतियां प्रकाशित हो चुकी हैं।
महर्षि जी ने ‘‘चेतना विज्ञान’’ की रचना की और उनका ये चेतना विज्ञान करोड़ों लोगों ने एक पाठ्यक्रम के रूप में लिया और अपने जीवन के आधार चेतना को विकसित कर ब्राह्मीय चेतना के स्तर तक पहुंचे।
महर्षि जी का सत्संकल्प कि मनुष्य जन्म संघर्ष के लिय नहीं, दुःख से व्यथित होने के लिये नहीं है, केवल आनन्द और मोक्ष के लिये हुआ है, इसी सिद्धांत पर आधारित कार्यक्रम उन्हें लगातार आगे बढ़ाते ही गये। वेद निर्मित, ज्ञान शक्ति और आनन्द चेतना के सागर, वेदान्तिक महर्षि वास्तविक ऐतिहासिक अमर जगद्गुरु हो गये।
महर्षि जी ने विश्व भर में व्याप्त समस्याओं और संघर्षों की समाप्ति के लिये ‘‘विश्व योजना’’ बनाई जिसके प्रमुख उद्देश्यों में व्यक्ति का पूर्ण विकास करना, प्रशासन की उपलब्धियों को बढ़ाना, शिक्षा के सर्वोच्च आदर्शों को स्थापित करना, समाज में प्रचलित विभिन्न प्रकार के अपराध और अप्रसन्ताकारक व्यवहार को समाप्त करना, पर्यावरण का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करना, व्यक्ति और समाज की अर्थ व्यवस्था को पूर्णता प्रदान करना और व्यक्ति के आध्यात्मिक लक्ष्यों की पूर्ति कराना था। इसके लिये महर्षि जी ने 2000 नये चेतना विज्ञान के शिक्षक तैयार किये और 2000 ‘‘विश्व योजना केन्द्र’’ स्थापित किये। ‘‘ज्ञान युग’’ की स्थापना के लिये महर्षि जी ने विश्व भ्रमण किया और ‘‘ महर्षि यूरोपियन रिसर्च यूनिवर्सिटी’’ प्रथम विश्वविद्यालय की स्थापना स्विटजरलैण्ड में करके फिर अनेक वैदिक, आयुर्वेदिक और प्रबन्धन विश्वविद्यालयों की स्थापना की। 

-ब्रह्मचारी गिरीश

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