अत्यन्त प्रभावी है महर्षि महेश योगी जी के द्वारा प्रणीत भावातीत ध्यान 

अत्यन्त प्रभावी है महर्षि महेश योगी जी के द्वारा प्रणीत भावातीत ध्यान 

भोपाल (महामीडिया) महर्षि जी ने आदर्श समाज की स्थापना के लिये विश्वव्यापी अभियान चलाया और 108 देशों में ‘‘योगिक उड़ान’’ का अभ्यास करने वाले समूह भेजे। इन देशों के वैज्ञानिकों ने और सरकारों ने यह पाया कि बड़ी संख्या में सामूहिक ध्यान अत्यन्त प्रभावी होता है। किसी भी राष्ट्र की जनसंख्या का एक प्रतिशत यदि सामूहिक भावातीत ध्यान करे तो सामूहिक चेतना में सतोगुणी की अभिवृद्धि होकर रजोगुणी और तमोगुणी नकारात्मक चेतना का शमन होता है। वैज्ञानिकों ने इस ‘महर्षि प्रभाव’ का नाम दिया। 1983 में पहली बार ‘‘टेस्ट आफ यूटोपिया’’ असेम्बली के नाम से 7000 योगिक फ्लायर्स फेयरफील्ड आयोवा, अमेरिका में एकत्र हुए और कई सप्ताहों तक सामूहिक भावातीत ध्यान, सिद्धि कार्यक्रम और योगिक फ्लाइंग का अभ्यास किया। तब वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया कि यदि विश्व की जनसंख्या के एक प्रतिशत के वर्गमूल बराबर व्यक्ति एक साथ, एक स्थान और समय पर सामूहिक योगिक उड़ान भरे तो सतोगुण बहुत अधिक बढ़ेगा और सारी नकारात्मकतायें स्वयं ही समाप्त हो जायेंगी। इस अनुभव और प्रयोग के पश्चात् सारे विश्व में अनेक विश्व शांति सभायें- ‘‘वर्ड पीस असैम्बलीस्’’ आयोजित की गई और उनके बहुत उत्तम परिणाम सामने आये।
महर्षि जी ने ‘‘रोग विहीन समाज’’ की स्थापना का न केवल नारा ही दिया बल्कि आयुर्वेद के शीर्षस्थ विद्वानों, शोधकर्ताओं, वैद्यों के साथ कई वर्षों तक शोध करके महर्षि आयुर्वेद के चिकित्सालयों और औषधि निर्माण शालाओं की स्थापना की। वैदिक स्वास्थ विधान के पाठ्यक्रमों की रचना करके हर व्यक्ति को स्वास्थ शिक्षा देने को विधान किया। देश-विदेश के अनेक संस्थानों में वैदिक स्वास्थ्य विधान के प्रमाणपत्र व उपाधि पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। मंत्र चिकित्सा पर अनेक शोध कराये गये और अनेक कष्टसाध्य रोगों की त्वरित चिकित्सा आज सारे विश्व में उपलब्ध है।
महर्षि जी ने सम्पूर्ण वैदिक वांगमय से चुन-चुनकर जीवनपरक और त्वरित लाभ प्रदाता सिद्धांतों और प्रयोगों के आधार पर ‘‘भूतल पर स्वर्ग निर्माण’’ का कार्यक्रम बनाया और इसे जन सामान्य को उपलब्ध कराया। महर्षि जी ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि व्यक्ति चाहे तो वह अपना वातावरण स्वर्ग जैसा बना सकता है। इसके लिये उसे वैदिक शाश्वत् सिद्धांतों और प्रयोगों को अपने जीवन में उपनाना होगा। व्यक्ति प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सिद्धहस्त होकर स्वयं अपने और दूसरों के जीवन के लिये स्वर्ग का निर्माता हो सकता है। यह विस्तृत अनोखी दुर्लभ विचार शक्ति केवल महर्षि जी की ही हो सकती थी।
महर्षि जी ने वेद को विश्व ब्रह्माण्ड के संचालन का संविधान बतलाया। उन्होंने बताया कि वेद ही वे प्रकृति के विधान- सृष्टि के संविधान हैं जिनसे समूचे विश्व ब्रह्माण्ड का निर्बिध्न, निरन्तर प्रशासन, अनादि काल से होता आ रहा है और अनन्त काल तक होता जायेगा। इसी सृष्टि के संविधान को आधार बनाकर उन्होंने ‘‘प्रशासन के पूर्ण सिद्धांत’’ नामक पुस्तक प्रकाशित की और ‘‘राजनीति के सर्वोच्च सिद्धांतों’’ का पाठ्यक्रम उपलब्ध कराया।
मनुष्य या किसी भी प्राणी या विश्व ब्रह्माण्ड के जीवन का आधार चेतना है। आज के वातावरण में शिक्षा जगत चेतना की शिक्षा से अनभिज्ञ है। बाल मंदिर से विद्यावारिधि या विद्यावाचस्पति तक के पाठ्यक्रमों में कहीं भी चेतना की शिक्षा का समावेश नहीं है। महर्षि जी ने समस्त विश्व में बड़ी संख्या में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की और चेतना पर आधारित-आत्मा पर आधारित शिक्षा को वर्तमान शिक्षा की मुख्य धारा में सम्मिलित किया। महर्षि जी की चेतना पर आधारित शिक्षा की विशेषता यह है कि इस शिक्षा में केवल बुद्धिपरक होकर ज्ञान पूर्ति नहीं की जाती, इस व्यवस्था में चेतना का निरन्तर विस्तार किया जाता है। विद्यार्थी की जिज्ञासा बढ़ती है और नया-नया सम्पूर्ण ज्ञान जो स्वयं उसकी चेतना में ही निहित है, वह प्रस्फुटित होकर व्यक्ति को महाज्ञानी बना देता है।
महर्षि जी ने शरीरिकी में नाड़ी तंत्र के शीर्ष वैज्ञानिकों एवं कुछ अन्य आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिकों को प्रेरित, प्रोत्साहित और मार्गदर्शित किया कि वे मानव शरीर की संरचना का विस्तृत अध्ययन करें और यह देखें कि वैदिक वांगमय की संरचना और उसकी कार्य प्रणाली में तथा मानव शरीर की संरचना और कार्यप्रणाली में क्या समानतायें हैं। जब वैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन प्रारम्भ किया तो वे चकित रह गये। उन्होंने पाया कि महर्षि जी केवल यूं ही नहीं कह रहे थे। वास्तवविकता यह पाई गई कि वेद और वैदिक वांगमय तथा मानव शरीर, दोनों की संरचना और कार्य प्रणाली एक ही है। अनुसंधान-कर्ताओं ने कहा कि शरीर मानो एक भवन है और वैदिक वांगमय उसका मानचित्र है। उसी मानचित्र के आधार पर शरीर का निर्माण हुआ है।
 
-ब्रह्मचारी गिरीश
 

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