गुरुदेव की कृपा का फल

गुरुदेव की कृपा का फल

भोपाल (महामीडिया)  गुरुदेव के जीवन को जब देखते हैं, परम तपस्वी वो भावातीत का जीवन था। ये हिमालय और विन्धगिरी की कन्दराओं में, वनों में, एकान्तवास, वो वर्षों उनका जीवन जैसा बीता है वो परा का जीवन था, वास्तविक परा की सत्ता लहरा रही थी उनके जीवन में, उनके चलने में, उनके फिरने में, उनके देखने में, उनके इन्द्रियों के व्यवहार में परा की सत्ता का लहरा था और उसका इतने जोर का प्रभाव पड़ा की सारे विश्व की चेतना में कि सदा के लिए युग परिवर्तन हुआ है। समय आ रहा है कि अब उसी भौतिक विज्ञान ने इन दिनों इतनी तरक्की की है। उसका कारण क्या था, पिछले 10 वर्षों में (1985 का प्रवचन है) भौतिक विज्ञान ने जितनी उन्नति की हेै उतनी पिछले शताब्दियों में नहीं हुई थी। कारण था विश्व चेतना में पवित्रता बढ़ना, सतोगुण बढ़ना और वो था गुरुदेव की कृपा का फल। तो अपने वसुधैव कुटुम्बकम् जो हमारा भारतीय संस्कृति का आदर्श रहा है कि हमारे कुटुम्ब का जब ब्रह्मीय चेतना में व्यवहार करना हमारा आदर्श था तो वसुधैव कुटुम्ब था। लोक लोकांतरों में हमारी प्रगति के अधीन नारद के कितने आख्यान हैं, वो कहां से कहा चले जा रहे हैं, किस स्वर्ग से किस नरक में चले जा रहे हैं, किस नरक से किस स्वर्ग में चले जा रहे हैं, ये समन्वय तत्व का व्यवहारिक रूप था कि यहां से वहां जाना कोई समय नहीं लगता था। सब कुछ सुगम था, सब कुछ सरल था, हनुमान जी के चरित्रों का क्या था, कितनेकित्ाने आदर्श ये सर्व समर्थता के व्यवहारिक प्रयोगों से हमारा वैदिक वांङ्गमय भरा पड़ा है कि संहिता तत्व एक व्यापक तत्व है और मानवीय चेतना में सहज स्वाभाविक रूप से वो अपनी पूर्णता में जागृत होता है। ये अभी वर्तमान की बात है भविष्य की बात नहीं है। उस विद्या को लेकर ये वेद विज्ञान विद्यापीठ एक आदर्श पुरुष निर्माण करने जा रही है। आदर्श पुरुष जिसकी विशेषता होगी राम झरोखे बैठ के, अत्यन्त सहज साधारण अपने चेतना में रहता वहीं से। यहां जो ये अग्निहोत्र की व्यवस्था प्रारम्भ होने जा रही है, प्रारम्भ इसलिए कह रहे हैं कि अग्निहोत्र प्राय: प्राय: समाप्त हो गया है और अग्निहोत्र की समाप्ति का परिणाम ये है कि बहुत से अग्निहोत्री यहां वहां हैं, जिनको कोई जानता नहीं है, उनके जीवन में प्रतिभा नहीं है, वेद मंत्र में जीवन की जो प्रतिभा होती है जीवन में वो प्रतिभा नहीं है, लेकिन हम उन असहाय से अग्निहोत्रियों को भी परम आदर की दृष्टि से देखते हैं, उनके चरण की धूल को अपने मस्तक में लगाते हैं इसलिए कि कम से कम उन्होंने शरीर की रक्षा की, प्राण न भी रहे हों। अग्निहोत्र कर्म में इस समय सजीवता नहीं है किन्तु शरीर तो है और उस शरीर में अनुप्राण संचार करने के लिए स्थापत्य वेद अपना है और वो स्थापत्य वेद की सारी प्रक्रियायें एक गुरु की कृपा दृष्टि के आधार पर इतनी उत्तमता से अब अग्निहोत्री के जीवन को पूर्णता में स्थापित करेंगे और संहिता में जो अनन्त सामर्थ्य विद्यमान है वह भारतीय घरों में मिलेगी। बच्चे खेलते हुए उस पूर्णता में बढ़ेंगे। अग्निहोत्र की व्यवस्था को पुन: स्थापित करने का जो ये समय आया है वो तभी आया है जब विश्व चेतना में तमोगुण कम हुआ है, रजोेगुण कम हुआ है। सारी अपनी प्राचीन भारत की सभ्यता-संस्कृति, वेद भूमि की सभ्यता संस्कृति जो परम निगूढ़ तत्वों के सहज स्वाविक पूर्णता से जागृत होने के कारण सारी व्यवस्थायें वैसी हो जायेंगी जैसी प्रकृति की व्यवस्था है जो सारे विश्व ब्रह्माण्ड को इतनी उत्तमता से संचालन करती है, इतनी आनुपूर्वी क्रम से सृष्टि का क्रम बनता है, जिसका हिसाब नहीं है। कितनी अनन्ततायें हैं, कितनी अनन्ततायें हैं लेकिन सारी अनन्ततायें कितनी सम्बद्ध हैं, परस्पर सम्बद्ध हैं, कालचक्र का नियमन इतने उत्तमता से हो रहा है। प्रकृति के उन नियमों के कारण परा के उन क्षेत्र, उन सर्वसमर्थ स्पन्दनों के कारण जो अब मानवीय चेतना में सहज सुगम रूप से पूर्णता में जागृत हो रहे हैं। गुरु कृपा का महत्व और इन सब दुरूह तत्वों का अनावरण इस युग में इस समय इस वर्ष जो ये हो रहा है केवल अपनी गुरु निष्ठा का फल है, गुरु कृपा का फल है। कोई भी चीज आज अपने लिए असम्भव नहीं है, भारत के लिए कोई भी चीज आज असम्भव नहीं है, वेद विज्ञान विद्यापीठ के लिए कोई भी वस्तु असम्भव नहीं है। दुनिया में सारी असम्भावनाओं को सम्भव करने के लिये ये अखाड़ा खोला गया है। ये विद्या का तीर्थ, ये वेद धाम, ये वेद विज्ञान विद्यापीठ में अब ये 1000 बच्चे हैं। 7000 होते ही जो हम कह रहे हैं कि कोई वस्तु असम्भव नहीं होगी, यहीं से बैठे-बैठे 7000 बालक वेद विज्ञान विद्यापीठ के विद्यार्थी सारे विश्व में प्रकृति का प्रशासन जो स्वाभाविक हो रहा है उसको जागृत करके सहज स्वाभाविक रूप से सर्वत्र सुख शांति और समृद्धि की लहरें लहराते रहेंगे। जब हमने उपाध्याय जी से कहा था कि आप इसके कुलपति होंगे तो उन्होंने धीरे से कहा कुलपति होता है जो 10000 विद्यार्थियों को अपने आश्रम में रखकर उनको पढ़ाता है। इनके जो 10000 विद्यार्थियों को अपने आश्रय में रखकर उनको पढ़ाता है। इनके मन में 7-50- 100-200 विद्यार्थियों को लेकर क्यों समय खराब कर रहे हैं, आपको ये नहीं लगता था कि आपको कुलपति होना चाहिए। वो चाहते थे जब 10000 विद्यार्थी हों तो कुलपति बनेंगे, नहीं तो लोग हसेंगे कि ये क्या कुलपति हैं। ये अपने भारतीय विद्वतजनों की जिनकी चेतना जागृत है वो यर्थाथता को पकड़ते हैं। नाम रख लिया कुलपति, अभी 10000 कैसे होगा, तबसे बराबर हमारे मन में हैं कि इसको 10000 विद्यार्थियों का कुलपति बनाना है। अभी तो हमने 7000 इसलिए कहा कि उतने में पर्याप्त होगा। उतने में पर्याप्त होगा सारी विश्व चेतना को सदा के लिए पवित्र करते रहना लेकिन हमारे कुलाधिपति की आकांक्षा तब पूरी होगी जब विद्यार्थियों की संख्या 10000 हो जायेगी। जब 7000 होंगे तो तो विश्व चेतना में इतनी द्रुत गति से सतोगुण बढ़ेगा कि फिर 10000 होंगे 20000 होंगे। सारे विश्व के प्रत्येक विद्यार्थी की चेतना में संहिता तत्व जागृत होगा, पूर्णता जागृत होगी, सब के सब ब्रह्मास्मि का नारा लगाते हुए बागम्भरणी सूक्त का पाठ करते हुए विचरेंगे। अपनी सड़कों पर सिद्धों की जमातें होंगी, भारत की सड़कों पर सिद्धों की जमातें होंगी। जितने जल्दी 7000 होते हैं उतने जल्दी सारे देश में मंगल होगा। अपनी राजनीति सारे विश्व की राजनीतियों का पथ प्रदर्शन करने वाली है और वो अभी करने वाली है, हमको 7000 की जरूरत है। इसीलिए कहा था 1-1 विद्यार्थी जो अभी तो सो गये हैं लेकिन सुशुप्ति में भी उनकी चेतना में जगाते हैं कि चलो 7000 बनो। ये गुरु कृपा से इतने जोर का समय आया है, इतना जोर का उबाल आया है, समस्त प्रकृति में इतना उल्लास है जिसका हिसाब नहीं और आज अपने गुरु चरणों का, पादुका का पूजन करके उसको इतनी प्रचुरता से जागृत किया है अपनी चेतना में उसका प्रभाव सारे विश्व चेतना में फैला है। कितने सारी चिट्ठी पत्रों के ढेर के ढेर लगे हैं। लोगों ने क्या लिखा है मालूम है? लोगों ने लिखा है कि हम इस गुरुपूर्णिमा में हम आपके दर्शन नहीं कर सके, हमें आपने दूर रहके क्या उपदेश दिया दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम ये उदगार आये हैं हजारों हजारों लोगों के। लाखों-लाखों लोगों के जो राष्ट्रीय अपने प्रधान हैं उनके ये उद्गार हैं कि आज इस वर्ष आपने दूर रहके जो गुरुपूर्णिमा मनाई उसका हमें उपदेश मिला कि दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम ये लोग दसियों वर्षों से इनका आसन उठ रहा है, इतना पवित्रता है, इतना इन लोगों ने सुना है ये वैदिक विश्व विद्यापीठ, वैदिक यूनिवर्सिटी खोलनी है। यूरोपीय, अमेरिकीय, दक्षिणी अमेरिका में इस यूनिवर्सिटी का स्थापित होना ही उस यूरोप की सामूहिक चेतना का, अमेरिका की सामूहिक चेतना का, दक्षिण अमेरिका की सामूहिक चेतना का जागरण इस स्तर तक हुआ है कि उन्हें शुद्ध ज्ञान मिल सके, इसलिए वैदिक यूनिवर्सिटी वहां हो गयी।
 

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