महामीडिया न्यूज सर्विस
बेगम जान

बेगम जान

विद्या बालन को एक जानदार परफॉर्मेंस की दरकार थी, और उन्हें बेगम जान के साथ वह मौका मिल गया है. बेगम जान में उन्होंने दिखाने की कोशिश की है कि अगर रोल सॉलिड ढंग से लिखा गया हो तो वे उसे बेहतरीन ढंग से अंजाम दे सकती हैं. ऐसा मौका इस बार उनके हाथ लग गया है. बंगाली हिट फिल्म राजकहिनी के इस हिंदी रीमेक में हर वह बात जो एक बेहतरीन सिनेमा के लिए जरूरी होती है. फिर चाहे वह बेहतरीन अदाकारी हो, कैमरे का कमाल हो, सॉलिड कैरक्टराइजेशन हो या कहानी. हर मोर्चे पर "बेगम जान" खरी उतरती है. फिल्म पूरी तरह से इस बात पर फोकस है कि मर्दों की दुनिया में औरतों को अपने दम पर जीना और मरना दोनों ही आता है.
कहानी : बेगम जान (विद्या बालन) एक ऐसे कोठे की मालकिन हैं, जो ऐसी जगह पर बना हुआ है जिसे बंटवारे के बाद भारत-पाक के बीच बंटवारे की लाइन खींचने और इस बॉर्डर पर सीमा चौंकी बनाने के लिए प्रशासन को अपने कब्जे में लेना बेहद जरूरी है। बेगम जान की इस कोठे में एक अधेड़ उम्र की महिला (ईला अरुण) भी रहती है, जिसे इस कोठे पर धंधा करने वाली सभी लड़कियां दादी मां कहती हैं। करीब दस से ज्यादा लड़कियों के इस कोठे की मालकिन बेगम जान पर यहां के राजा जी (नसीरुद्दीन शाह) पूरी तरह से मेहरबान हैं। सो किसी में हिम्मत नहीं जो बेगम जान के इस कोठे की ओर बुरी नजर डाल सके। यहां का कोतवाल (राजेश शर्मा) और इलाके का मुखिया भी अक्सर देर रात को मस्ती के लिए इसी कोठे पर आते हैं। बेगम को किसी की जरा भी परवाह नहीं, कोठे पर रहने वालीं लड़कियों की दुनिया इस कोठे तक ही सीमित है। इस कोठे के सभी कायदे-कानून खुद बेगम जान ही बनाती है और इन कायदे-कानूनों पर कोठे को चलाती भी है। बेगम का एक चेहरा बेशक जालिम है जो यहां रहने वाली लड़कियों से मारपीट करके धंधा कराती है तो वहीं दूसरा चेहरा ऐसा भी है जो इन लड़कियों के दुख के वक्त में हमेशा उनके साथ है। इस कोठे की दुनिया उस वक्त बदलती है जब भारत-पाक को विभाजित करने के लिए सरकारी अफसर दोनों देशों के बीच बंटवारे की लाइन खींचने का काम शुरू करते हैं। बेगम को इस बंटवारे या देश को मिल रही आजादी से कुछ लेना-देना नहीं, उसे तो बस अपने धंधे को और ज्यादा चमकाने और अपने इस कोठे को बचाने के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता। बेगम और यहां रहने वाली सभी लड़कियां किसी भी हालात में अपनी इस कोठी (जिसे हर कोई कोठा कहता है) खाली करने को राजी नहीं, बेगम की आाखिरी उम्मीदें राजाजी पर टिकी हैं जिन्होंने उससे दिल्ली जाकर उसके इस कोठे को बचाने का वादा किया है। दूसरी ओर, इस कोठे के आस-पास बंटवारे की कांटेदार लगने का काम शुरू हो चुका है। दो सरकारी ऑफिसर इलियास (रजत कपूर), श्रीवास्तव जी (आशीष विद्यार्थी) यहां के पुलिस कोतवाल और सिपाहियों की टुकड़ी के साथ यह काम कर रहे हैं, लेकिन बेगम जान के कोठे को तोड़कर यहां तार लगाने काम शुरू नहीं हो पा रहा है। बेगम जान की मुश्किलें उस वक्त बढ़ जाती है जब दिल्ली से लौटकर राजाजी उसे कोठा खाली करने की सलाह देते हैं, लेकिन बेगम और यहां रहने वाली लड़कियां इस कोठे को खाली करने के लिए तैयार नहीं। सो दोनों सरकारी ऑफिसर कोठा खाली कराने की डील इलाके के एक शातिर बदमाश कबीर (चंकी पांडे) को सौंपते है, जिसे अब किसी भी कीमत पर बेगम जान के कोठे को खाली कराना है।
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