पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ नाइंसाफी

पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ नाइंसाफी

नई दिल्ली[ महामीडिया ]बीते साल भारत के पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के शहर कराची में एक विरोध रैली निकली थी। इस रैली में शामिल लोग देश में हिंदू लड़कियों के जबरन कराए जा रहे धर्म परिवर्तन का विरोध कर रहे थे। जून में भी सिंध प्रांत के बदीन जिले में दर्जनों हिंदू परिवारों ने इस्लाम धर्म को कुबूल कर लिया। इस समारोह का वीडियो क्लिप भी वायरल हुआ था। हालांकि, पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन का सटीक डाटा मौजूद नहीं है। यहां कुछ परिवर्तन मन से किए गए तो कुछ मजबूरी में।सेकंड क्लास सिटिजन माने जाने वाले पाकिस्तानी के हिंदुओं को हर चीज के लिए भेदभाव का सामना करना पड़ता है। फिर चाहे वो रहने के लिए घर, नौकरी या सरकारी सुविधा हों। अल्पसंख्यकों को लंबे वक्त से बहुसंख्यकों में जुड़ने, भेदभाव और सांप्रदायिक हिंसा से बचने के लिए तैयार किया जा रहा है।मोहम्मद असलम शेख जून तक सावन भील के नाम से पहचाने जाते थे। उन्होंने कहा, "हम जो चाह रहे हैं वो सामाजिक हैसियत है, और कुछ नहीं। गरीब हिंदू समुदायों में ये परिवर्तन बेहद आम हैं।" असलम ने भी बदीन में परिवार के साथ इस्लाम को अपनाया। बदीन में हुआ यह आयोजन अपने आकार के लिए भी खास था। यहां 100 से ज्यादा लोग शामिल हुए थे। मुस्लिम धर्मगुरू और चैरिटी समूह अल्पसंख्यकों को फुसलाते हैं और नौकरी या जमीन देने की पेशकश करते हैं, लेकिन तभी जब वे धर्मबदलेंगे।कोरोनावायरस महामारी के दौरान पाकिस्तान की इकोनॉमी की हालत खराब हो गई है और इसका दबाव देश के अल्पसंख्यकों पर पड़ा है। वर्ल्ड बैंक ने अनुमान लगाया है कि वित्तीय वर्ष 2020 में अर्थव्यवस्था 1.3 प्रतिशत कम हो जाएगी और पाकिस्तान की 7.4 करोड़ नौकरियों में से 1.8 करोड़ नौकरियां जा सकती हैं।हाल ही में एक समारोह आयोजित हुआ, जहां सिंध स्थित मतली में लगे तंबुओं में अजान सुनाई दी। यह जमीन कराची के एक अमीर मुस्लिम व्यापारी समूह ने धर्म बदलने वाले दर्जनों हिंदू परिवारों के लिए खरीदी थी। टेंट के पास ही एक मस्जिद में मोहम्मद अली प्रार्थना से पहले रस्म अदा कर रहे थे। मोहम्मद अली का पहले नाम राजेश था। उन्होंने पिछले साल 205 अन्य लोगों के साथ धर्म बदल लिया था।बीते साल मौलवी नईम ने अली के सामने बंधुआ मजदूरी से आजाद कराने की पेशकश के बाद उन्होंने अपने परिवार के साथ इस्लाम में धर्म परिवर्तन कर लिया था। वे एक जगह उधारी नहीं चुकाए जाने के कारण नौकर के तौर पर काम कर रहे थे। अली भील जाति से आते हैं, जो निम्न हिंदुओं में से एक है। उन्होंने कहा, "इस्लाम में हमें एकता और भाईचारे का एहसास हुआ, इसलिए हम बदलकर यहां आ गए।"निम्न जाति के पाकिस्तानी हिंदू कई बार बंधुआ मजदूरी के शिकार होते हैं। 1992 में इसे रद्द कर दिया गया था, लेकिन यह प्रथा अभी भी जारी है। ग्लोबल स्लेवरी इंडेक्स ने अनुमान लगाया है कि 30 लाख से ज्यादा पाकिस्तानी उधारी के कारण गुलामी में रहते हैं।जमींदार हिंदुओं को ऐसा कर्ज देकर गुलामी में फंसाते है, जिसे वे जानते हैं कि यह कभी नहीं चुकाया जा सकता। इसके बाद उन्हें और उनके परिवार को उधारी चुकाने के लिए काम के लिए मजबूर किया जाता है। कई बार महिलाओं का यौन शोषण भी होता है।नईम के मदरसे ने कई हिंदुओं को बंधुआ मजदूरी से आजाद कराया है। उन्होंने इस्लाम में शामिल होने के बदले उनका कर्ज खत्म किया। जब अली और उनके परिवार ने धर्म बदला तो नईम और अमीर मुस्लिम व्यापारी समूहों ने उन्हें जमीन का एक टुकड़ा दिया और काम खोजने में मदद की। उन्होंने इसे एक इस्लामी जिम्मेदारी समझी। नईम कहते थे "जो लोग इस संदेश को फैलाने और गैर मुस्लिमों को इस्लाम में लाने के लिए प्रयास कर रहे हैं, उन्हें भविष्य में आशीर्वाद मिलेगा।"

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